पर्यावरण अध्ययन · CTET नोट्स

जल — स्रोत, चक्र एवं संरक्षण | CTET EVS P1

जल बच्चे के परिवेश का सबसे परिचित संसाधन है और साथ ही सबसे संकटग्रस्त भी। NCERT की आस-पास पुस्तकें जल को कई अध्यायों में बुनती हैं — घर का पीने का पानी, गाँव का कुआँ, रेलगाड़ी जिस नदी को पार करती है, और वे महिलाएँ जो मीलों चलकर मटका भरकर लाती हैं। CTET पेपर 1 के लिए जल का परीक्षण विषयवस्तु (स्रोत, जल चक्र, पारम्परिक संग्रह, संरक्षण) के साथ-साथ शिक्षण-शास्त्र (कक्षा-3 का शिक्षक टपकते नल से लेकर साझा संसाधन की धारणा तक बच्चों को कैसे ले जाए) के दृष्टिकोण से भी किया जाता है।

यह विषय EVS खंड में नियमित रूप से 3–5 प्रश्न देता है, जो NCERT अध्याय पानी, एकीकृत विषयों पानी और आवास, तथा परियोजना कार्य व समुदाय-सर्वेक्षण पर शिक्षण-शास्त्र प्रश्नों से लिए जाते हैं। इसमें निपुणता के लिए तथ्यात्मक स्मरण (बावड़ी, जोहड़, खड़ीन, एरी, ज़ाबो) और एकीकृत EVS दृष्टिकोण के अनुप्रयोग दोनों आवश्यक हैं।

WATER

जल के स्रोत — सतही एवं भू-जल

बच्चे प्रतिदिन कई स्रोतों से जल का अनुभव करते हैं — घर का नल, गाँव का कुआँ, विद्यालय के पास का तालाब, खेत को सींचने वाली नहर। EVS इन्हें दो बड़ी श्रेणियों में व्यवस्थित करता है: सतही जल (surface water) और भू-जल (groundwater)

सतही जल वह जल है जो झीलों, तालाबों, नदियों, झरनों, जलाशयों और महासागरों में एकत्र होता है। यह दिखाई देता है, सुलभ है और अधिकांश कृषि एवं नगरीय उपयोग का आधार है। भारत की महान नदियाँ — गंगा, यमुना, गोदावरी, कृष्णा, ब्रह्मपुत्र — करोड़ों लोगों की सतही-जल जीवनरेखाएँ हैं। सतही जल वर्षा एवं हिमपिघलन से पुनर्भरित होता है तथा सहायक नदियों और बेसिनों से जुड़ा रहता है।

भू-जल वह जल है जो मिट्टी एवं चट्टान से रिसकर कणों के बीच की रिक्तियों में, जिन्हें जलभृत (aquifers) कहते हैं, संचित हो जाता है। यह ऊपर से अदृश्य रहता है परन्तु हम तक इन माध्यमों से पहुँचता है:

  • कुएँ — जल-तल तक खोदी गई खुली गहराइयाँ।
  • नलकूप एवं बोरवेल — मोटर एवं पम्प से बहुत गहराई तक खोदी गई संकरी पाइप।
  • हैंडपम्प (चपाकल) — गाँवों एवं विद्यालयों में परिचित लीवर-संचालित पम्प।
  • झरने — स्थान जहाँ जल-तल स्वतः धरातल को छूता है, जो पहाड़ी क्षेत्रों में सामान्य है।

NCERT कक्षा-3 का अध्याय बूँद-बूँद से तथा कक्षा-4 का फूलों की घाटी इन विचारों को परिभाषाओं के बजाय कहानियों के माध्यम से बच्चों तक पहुँचाते हैं। राजस्थान का बच्चा चपाकल को पहचानता है; केरल का बच्चा आँगन के खुले कुएँ को जानता है।

शिक्षक के लिए एक महत्वपूर्ण भेद: सभी जल-स्रोत समान रूप से स्वच्छ जल नहीं देते। नदी का जल खनिज-समृद्ध होता है पर प्रायः प्रदूषित रहता है; भू-जल सामान्यतः अधिक स्वच्छ होता है किन्तु कुछ क्षेत्रों में इसमें हानिकारक मात्रा में फ्लोराइड, आर्सेनिक या लोहा मिल जाता है। CTET प्रायः इसका परीक्षण किसी परिदृश्य के माध्यम से करती है — फ्लोरोसिस से पीड़ित बच्चों वाले गाँव में शिक्षक को इसे भू-जल की गुणवत्ता से जोड़ना आना चाहिए।

जल चक्र

जल चक्र (water cycle) यह समझाता है कि एक ही जल पृथ्वी की सतह, वायुमण्डल और भूमिगत भण्डारों के बीच निरन्तर कैसे घूमता रहता है। यद्यपि NCERT कक्षा-5 में चक्र औपचारिक रूप से प्रस्तुत होता है, बहुत पहले से अध्याय भूमिका तैयार करते हैं — धूप में सूखता गीला रूमाल, ठंडे गिलास पर बनतीं बूँदें, वर्षा से पूर्व उमड़ते बादल।

चक्र की चार मुख्य प्रक्रियाएँ इस क्रम में पढ़ायी जानी चाहिए:

  • वाष्पीकरण — सूर्य महासागरों, नदियों, तालाबों और यहाँ तक कि पत्तियों से जल को गरम कर अदृश्य जलवाष्प में बदल देता है। तापमान अधिक हो तथा सतह-क्षेत्र बड़ा हो तो दर तेज होती है; तापमान कम तथा सतह कम होने पर धीमी।
  • संघनन — जब वाष्प ऊपर उठकर ऊँचाई पर ठण्डी होती है तो वह छोटी जल-बूँदों में बदलकर बादल बनाती है।
  • वर्षण — जब बूँदें पर्याप्त भारी हो जाती हैं तो वर्षा, हिम, ओले या स्लीट के रूप में नीचे गिरती हैं।
  • संग्रहण — गिरा हुआ जल महासागरों, झीलों, नदियों में एकत्र होता है तथा भूमि में रिसकर जलभृतों को पुनर्भरित करता है। यहीं से चक्र पुनः आरम्भ होता है।

CTET में दो शैक्षणिक बिन्दु बार-बार परखे जाते हैं:

(क) चक्र एक सतत लूप है, एकतरफा प्रक्रिया नहीं — जल न तो बनता है न समाप्त होता, केवल अवस्थाएँ बदलती हैं।

(ख) शिक्षक को वाष्पीकरण और संघनन को रसोई-गतिविधियों से दिखाना चाहिए — केतली में पानी उबलना, उसके ऊपर प्लेट रखकर बूँदें बनाना — केवल आरेख रटाने से नहीं। NCF 2005 इसे 'विज्ञान करना' कहता है, 'विज्ञान के बारे में पढ़ना' नहीं।

पौधों से होने वाला वाष्पोत्सर्जन प्रायः पाँचवीं प्रक्रिया के रूप में जोड़ा जाता है, विशेषकर जंगलों की भूमिका पढ़ाते समय। वन-विनाश से वाष्पोत्सर्जन घटता है, चक्र कमजोर होता है और स्थानीय सूखापन बढ़ता है।

जल के गुण एवं अवस्थाएँ

जल तीन अवस्थाओं में पाया जाता है — ठोस (बर्फ), तरल (पानी) और गैस (जलवाष्प) — और ऊष्मा देने या लेने पर एक अवस्था से दूसरी में बदल जाता है। ये परिवर्तन किसी भी पाठ्यपुस्तक से पहले बच्चों के लिए परिचित हैं: गिलास में बर्फ पिघलती है, गीले कपड़े रस्सी पर सूखते हैं, हाण्डी से भाप उठती है।

अवस्था-परिवर्तन के मुख्य रूप:

  • गलन — ठोस से तरल (बर्फ → जल), ऊष्मा देने पर।
  • हिमायन — तरल से ठोस (जल → बर्फ), 0°C से नीचे ऊष्मा हटाने पर।
  • वाष्पीकरण — तरल से गैस, हर तापमान पर सतह से होता है।
  • क्वथन — 100°C पर पूरे तरल में तीव्र गैसीकरण।
  • संघनन — वाष्प के ठण्डा होने पर गैस से तरल।

प्राथमिक EVS के लिए प्रासंगिक गुण:

  • शुद्ध जल रंगहीन, स्वादहीन एवं गन्धहीन होता है।
  • इसे सार्वत्रिक विलायक कहते हैं — यह नमक, चीनी, अनेक खनिज घोलता है; अतः पीने का जल विरल ही 'शुद्ध' H₂O होता है।
  • जमने पर इसका आयतन बढ़ता है — बर्फ जल पर तैरती है। यह एकमात्र गुण जमी हुई झीलों के नीचे जलीय जीवन को जीवित रखता है।
  • जल ऊँचाई से नीचे की ओर बहता है — यही नहरों, नदियों और गुरुत्व-आधारित नलों का आधार है।

CTET प्रायः वाष्पीकरण को नियन्त्रित करने वाली शर्तों — तापमान, सतह-क्षेत्र, आर्द्रता और वायु — का परीक्षण करती है। शिक्षक को बच्चों के साथ ये जाँचें करवानी चाहिए: चौड़ी प्लेट और सँकरे गिलास में बराबर जल सुखाना, धूप और छाया में रखना। ये जाँचें केवल विज्ञान-शिक्षण नहीं हैं, बल्कि NCF 2005 जिन प्रक्रिया-कौशलों — अवलोकन, अनुमान, निष्कर्ष — को EVS के केन्द्र में रखती है, उनका प्रतिरूप भी हैं।

जल की कमी एवं इसके कारण

यद्यपि पृथ्वी की सतह का लगभग तीन-चौथाई भाग जल से ढका है, मानव उपयोग योग्य स्वच्छ जल इसका 1% से भी कम है। भारत में जल-संकट सबसे दृश्य और राजनीतिक रूप से चर्चित पर्यावरणीय मुद्दा है — और NCERT EVS पुस्तकें इसे जानबूझकर कक्षा में लाती हैं, जैसे कहानियाँ नन्दू के साथ एक दिन, फूलों की घाटी, तथा कक्षा-5 का अध्याय सुनीता अंतरिक्ष में

भारत में जल-संकट के मुख्य कारण:

  • भू-जल का अति-दोहन — सिंचाई के लिए बोरवेल और गहरे, और गहरे होते जाते हैं, जिससे जल-तल गिर रहा है, विशेषकर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, तमिलनाडु, कर्नाटक में।
  • जनसंख्या-दबाव एवं शहरीकरण — शहर बढ़ते हैं पर जल-तंत्र में अनुपातिक निवेश नहीं होता; झुग्गियों में प्रायः नल नहीं होता।
  • प्रदूषण — मल-जल, औद्योगिक बहिःस्राव और कृषि रसायन कई सतही स्रोतों को पीने योग्य नहीं रहने देते, उपयोगी भण्डार वस्तुतः घट जाता है।
  • पारम्परिक जल-निकायों का लोप — तालाब, ताल और बावड़ियाँ निर्माण के लिए पाट दी गयीं।
  • वन-विनाश — पेड़ कम होने से अन्तःस्यन्दन घटा, बहाव बढ़ा, स्थानीय मानसून कमजोर हुआ।
  • जलवायु परिवर्तन — अनियमित मानसून, हिमालयी हिमनदों का पिघलना और लम्बे सूखे।

भौतिक कमी से सामाजिक आयाम अविभाज्य हैं। प्रायः महिलाएँ और लड़कियाँ ही घण्टों चलकर पानी लाती हैं; निम्न जाति के घरों को सामान्य कुएँ से वंचित रखा जाता है; नगर ग्रामों से अनुपात-विहीन रूप से अधिक जल खपाते हैं। NCF 2005 की अपेक्षा है कि EVS शिक्षक विज्ञान के साथ इन सामाजिक पक्षों को भी कक्षा में लाये — जैसे झुग्गी में रहने वाले परिवार और शॉवर वाले फ्लैट के परिवार की खपत की तुलना।

CTET-अभ्यर्थी के लिए सार: EVS में जल-कमी सदा भौतिक-पर्यावरणीय और सामाजिक-न्याय का संयुक्त मुद्दा है — कभी एकल नहीं।

भारत की पारम्परिक जल संग्रह संरचनाएँ

टैंकरों और सरकारी बाँधों से बहुत पहले, भारत भर के समुदायों ने मानसून की हर बूँद को संचित और संगृहीत करने के अद्भुत परिष्कृत तंत्र विकसित कर लिये थे। NCERT कक्षा-5 का अध्याय दीवार के उस पार और कक्षा-4 का फूलों की घाटी इनमें से कई का उल्लेख करते हैं। CTET ने बार-बार इन क्षेत्रीय संरचनाओं की पहचान का परीक्षण किया है।

  • बावड़ी / बावली (stepwell) — राजस्थान, गुजरात, दिल्ली: गहरी, दीवार वाली बावड़ियाँ जिनके सीढ़ीनुमा किनारे जल-स्तर तक उतरते हैं; जल-स्रोत भी और सामुदायिक स्थल भी। चांद बावड़ी (आभानेरी) और रानी-की-वाव (पाटन — यूनेस्को स्थल) उदाहरण हैं।
  • जोहड़ — राजस्थान, हरियाणा: मौसमी नालों पर मिट्टी के छोटे बाँध जो बहाव रोकते हैं तथा भू-जल पुनर्भरित करते हैं। राजेन्द्र सिंह तथा तरुण भारत संघ ने अलवर में जोहड़ पुनः जीवित कर पूरी नदियाँ लौटा दीं।
  • खड़ीन — जैसलमेर, राजस्थान: चट्टानी जलग्रहण से बहाव एक ऐसे निचले खेत में आता है जिसे मिट्टी की बाँध से घेरा गया हो; जल भीतर सोखकर नम मिट्टी पर फसलें बोयी जाती हैं।
  • टाँका — पश्चिमी राजस्थान: आँगन के भीतर भूमिगत कुण्ड जो छतों और पक्के अहाते से वर्षा-जल को नालियों के माध्यम से एकत्र करते हैं।
  • एरी — तमिलनाडु: तालाबों की विशाल शृंखला (ऐतिहासिक रूप से लगभग 39,000), इस प्रकार जुड़ी कि एक का अतिरिक्त जल दूसरे में जाये, धान-खेतों की सिंचाई करे।
  • आहर-पईन — दक्षिण बिहार: पईन नदियों से बनी जल-वाहक नालियाँ; आहर जलग्रहण बेसिन; दोनों मिलकर विशाल क्षेत्रों को सींचते हैं।
  • ज़ाबो — नागालैंड: पहाड़ी ढलानों पर वन, सीढ़ीदार खेत, तालाब और पशु-बाड़े का संयुक्त तंत्र, जो धान और मत्स्य के लिए वर्षा-जल पकड़ता है।
  • बाँस-टपक सिंचाई — मेघालय: 200 वर्ष पुरानी प्रणाली, जो चीरे हुए बाँस की नालियों से झरनों का जल दूर-दूर तक ले जाती है।

इन सबमें साझा है एक गहरी पारिस्थितिक समझ: प्रत्येक अपने भूभाग के अनुरूप, स्थानीय सामग्री से, सामूहिक रूप से बना और संभाला गया, तथा पीने, सिंचाई और पशुओं के लिए जल को एक साथ साधता है। EVS शिक्षण-शास्त्र इन्हें स्थानीय बुद्धि के मूर्त उदाहरणों के रूप में प्रयोग करता है — NCF 2005 की एक मुख्य धारणा।

वर्षा जल संग्रह एवं आधुनिक विधियाँ

आधुनिक वर्षा-जल संचयन (Rainwater Harvesting / RWH) पारम्परिक विचारों पर ही टिका है किन्तु शहरी छतों, पक्की सतहों और ठोस इमारतों के अनुरूप ढाला गया है। कई राज्यों ने — सबसे पहले 2001 में तमिलनाडु ने — नये निर्माण के लिए RWH अनिवार्य कर दिया है।

दो मूल दृष्टिकोण:

  • सीधे उपयोग हेतु संग्रहण — छत का वर्षा-जल पाइप से छानकर टंकी में संग्रहित होता है तथा दैनिक उपयोग में आता है।
  • भू-जल पुनर्भरण — जल को सोखने वाले गड्ढों, रिचार्ज कुएँ या परकोलेशन तालाबों की ओर भेजा जाता है ताकि भूमिगत जल-तल पुनः भर सके।

सामान्य छत-RWH तंत्र में होते हैं:

  • स्वच्छ छत — जलग्रहण
  • जल को एकत्र व प्रवाहित करने वाली गटर एवं डाउनपाइप।
  • फर्स्ट-फ्लश उपकरण — आरम्भिक गंदा बहाव (धूल, पक्षी-विष्ठा) हटाने हेतु।
  • फ़िल्टर कक्ष (बजरी एवं रेत) — जल साफ करने हेतु।
  • संग्रहण टंकी, अथवा जलभृत तक ले जाता पुनर्भरण ढाँचा।

कक्षा के लिए प्रासंगिक लाभ:

  • टैंकरों और भू-जल पम्पिंग पर निर्भरता घटती है।
  • नगरीय बाढ़ कम होती है क्योंकि बहाव घटता है।
  • जल-तल पुनर्भरित होता है — दीर्घकालिक रूप से सबसे किफायती हल।
  • जल-गुणवत्ता सुधरती है (पुनर्भरित भू-जल प्राकृतिक रूप से छन जाता है)।

EVS शिक्षक बच्चों को किसी क्रियाशील RWH तंत्र को दिखाने ले जाएँ — कई सरकारी विद्यालयों में निदर्शन इकाइयाँ हैं, और कई शहर मानसून में विद्यालयी जल-ऑडिट करवाते हैं। RWH पर CTET प्रश्न प्रायः मूल उद्देश्य को परखते हैं — जल-संरक्षण एवं भू-जल पुनर्भरण — इसलिए अभ्यर्थी को उन विकल्पों से बचना है जो RWH को बाढ़ बढ़ाने वाला या जल को पीने योग्य न रहने देने वाला बताते हैं। एक सरल नारा: 'जहाँ गिरे जल, वहीं पकड़ो जल।'

जल प्रदूषण एवं स्वास्थ्य

प्रदूषित जल भारत में बाल-रोगों का सबसे बड़ा एकल कारण है। NCERT EVS पाठ्यपुस्तक प्रदूषण को किसी प्रदूषित नदी, बदबूदार नाले या असुरक्षित होते सामुदायिक कुएँ की कहानियों के माध्यम से प्रस्तुत करती है। शिक्षण का उद्देश्य भयभीत करना नहीं, अपितु बच्चे को पहचानने, समझाने और कार्य करने में सक्षम बनाना है।

जल प्रदूषण के मुख्य स्रोत:

  • घरेलू मल-जल — अनुपचारित घरेलू अपशिष्ट जो नदियों-झीलों में मिलता है।
  • औद्योगिक बहिःस्राव — चमड़ा शोधन, वस्त्र-रंगाई, कागज-मिल, इलेक्ट्रोप्लेटिंग से निकले रसायन।
  • कृषि अपवाह — खाद और कीटनाशकों के अवशेष वर्षा से नालों में पहुँचते हैं; नाइट्रेट-समृद्ध अपवाह से शैवाल-वृद्धि होती है।
  • ठोस अपशिष्ट — प्लास्टिक, पैकेजिंग और घरेलू कचरा जल-निकायों को जाम करता है।
  • प्राकृतिक संदूषण — विशिष्ट क्षेत्रों के भू-जल में फ्लोराइड, आर्सेनिक एवं लोहा (पश्चिम बंगाल — आर्सेनिक, राजस्थान — फ्लोराइड)।
  • धार्मिक एवं उत्सव-अपशिष्ट — फूल, प्रतिमाएँ, राख आदि बड़ी मात्रा में नदियों में।

सामान्य जल-जनित रोग: दस्त, हैजा, टाइफाइड, हेपेटाइटिस A एवं E, पीलिया, पेचिश, कृमि-संक्रमण। ये स्वच्छता-अभाव से घनिष्ठ रूप से जुड़े हैं; स्वच्छ भारत अभियान प्रदूषण और रोग को एक साथ साधता है।

पढ़ाने योग्य सरल शुद्धिकरण विधियाँ:

  • उबालना — सबसे विश्वसनीय घरेलू विधि।
  • कपड़े से छानना — केवल दृश्य कणों को हटाता है।
  • बालू-बजरी फ़िल्टर — मामूली गंदे जल पर कारगर।
  • क्लोरीनीकरण — आपातकाल में क्लोरीन गोलियों से।
  • सौर-निस्संक्रमण (SODIS) — स्वच्छ बोतल का जल 6 घण्टे तक धूप में।

CTET प्रायः जल-प्रदूषण को सामाजिक विषयों से जोड़कर पूछती है — कि कोई विशेष समुदाय ही प्रदूषित स्रोत क्यों उपयोग कर रहा है, या हाथ धोने से कैसे संक्रमण घटता है। EVS शिक्षण-शास्त्र की अपेक्षा है कि शिक्षक बीमारी को 'जानने' से बढ़कर इस पर 'चर्चा' तक पहुँचे कि विद्यालय और परिवार क्या बदल सकते हैं।

EVS में जल संरक्षण पढ़ाना

EVS का लक्ष्य जल बचाने पर भाषण देना नहीं — ऐसा बच्चा गढ़ना है जो टपकते नल को देखकर बन्द कर देता है। NCF 2005 और EVS की पोज़ीशन-पेपर इस बात पर बल देते हैं कि संरक्षण अनुभव, अवलोकन एवं कर्म से सिखाया जाता है, नारों से नहीं।

प्रभावी कक्षा-रणनीतियाँ (CTET में नियमित परीक्षित):

  • जल-ऑडिट — बच्चे मापें कि उनका परिवार स्नान, भोजन, धुलाई पर कितना जल खर्च करता है; परिवारों और मौसमों में तुलना करें। इससे EVS, गणित और आँकड़ा-संचालन एकीकृत होते हैं।
  • लीक-खोज — बच्चे विद्यालय और घर में टपकते नल, टूटी पाइप, खुले होज़ की सूची बनाएँ; दिन में बर्बाद जल का अनुमान लगाएँ।
  • एक-जल-स्रोत-गोद-लो — कक्षा कोई निकट का तालाब, ताल या कुआँ गोद ले, वर्ष भर अवलोकन करे, बदलाव चित्रित करे, पंचायत या नगरपालिका को सूचित करे।
  • कहानी एवं नाटक — बच्चे लोककथा, जल-बूँद की यात्रा, या कुएँ के बँटवारे पर चर्चा करते समुदाय का अभिनय करें।
  • बड़े-बुजुर्ग का साक्षात्कार — दादी से पूछें कि बचपन में वे जल का उपयोग कैसे करती थीं, गाँव में कौन-से कुएँ थे, क्या बदला।
  • क्षेत्र-भ्रमण — जल-शोधन संयंत्र, RWH-इकाई, स्थानीय बावड़ी या नदी-तट तक।

स्मरणीय शिक्षण-सिद्धान्त:

  • ज्ञात से अज्ञात की ओर — घर के नल से आरम्भ करके नदी, बाँध, जलभृत तक।
  • भाषा, गणित, कला और सामाजिक अध्ययन को जोड़कर — 'जल पर एक अध्याय' नहीं, बल्कि एक विषयवस्तु
  • 5E मॉडल (Engage–Explore–Explain–Elaborate–Evaluate) तथा CTET में बार-बार परखा गया अनुभवात्मक दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से प्रयोग करें।
  • परियोजना, पोस्टर, सर्वेक्षण और मौखिक प्रस्तुति से मूल्यांकन करें — केवल कागज-पेन्सिल परीक्षण से नहीं।

अन्तिम कसौटी व्यवहार पर है: क्या बच्चा ब्रश करते समय नल बन्द करता है? क्या वह माँड (चावल का पानी) नाली में गिराने पर प्रश्न उठाता है? यही NCF 2005 का अर्थ है — 'मूल्यों को कर्म में बदलना'।

अभ्यास प्रश्न

Q1. वाष्पीकरण की प्रक्रिया निम्नलिखित में से किस स्थिति में सबसे धीमी होगी?

  • सतह क्षेत्र और तापमान दोनों में वृद्धि
  • सतह क्षेत्र बढ़ता है लेकिन तापमान घटता है
  • सतह क्षेत्र घटता है लेकिन तापमान बढ़ता है
  • सतह क्षेत्र और तापमान दोनों में कमी

व्याख्या: वाष्पीकरण तापमान, सतह-क्षेत्र, आर्द्रता और वायु पर निर्भर करता है। उच्च तापमान और बड़ा सतह-क्षेत्र इसे तेज करते हैं। चारों विकल्पों में से वह स्थिति, जहाँ तापमान घटता है और तीव्र वाष्पीकरण की कोई पूरक दशा नहीं रहती, सबसे धीमी दर देती है — पानी ठण्डा होकर भी भापने का प्रभावी कारक नहीं पाता।

स्रोत: CTET Dec 2018 P1, Q62

Q2. नदी बाँधों से उत्पन्न जलविद्युत के लिए निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य नहीं है?

  • बाँध टिकाऊ विकास को प्रोत्साहित करते हैं।
  • यह पानी या हवा को प्रदूषित नहीं करता।
  • जलविद्युत सुविधाओं से बड़े पर्यावरणीय प्रभाव हो सकते हैं।
  • बाँध स्वदेशी लोगों को अपनी नदी की जीवनरेखाओं से अलग करते हैं।

व्याख्या: जलविद्युत नवीकरणीय है तथा वायु-जल को सीधे प्रदूषित नहीं करती, और बड़े बाँधों के पारिस्थितिक-सामाजिक प्रभाव भी होते हैं। परन्तु 'बाँध स्वदेशी लोगों को नदी की जीवनरेखाओं से अलग करते हैं' को लाभ-कथन के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जबकि विस्थापन वास्तव में हानियों में से एक है — इसलिए यही कथन जलविद्युत के सामान्य प्रशंसा-तर्क से असंगत है।

स्रोत: CTET Dec 2018 P1, Q66

Q3. निम्न में से कौन-सा क्रम जल चक्र को सही दर्शाता है?

  • संघनन → वर्षण → वाष्पीकरण → संग्रहण
  • वर्षण → वाष्पीकरण → संघनन → संग्रहण
  • वाष्पीकरण → संघनन → वर्षण → संग्रहण
  • संग्रहण → संघनन → वाष्पीकरण → वर्षण

व्याख्या: जल चक्र सूर्य द्वारा सतही जल को वाष्प में बदलने (वाष्पीकरण) से आरम्भ होता है। वाष्प ऊपर उठकर ठण्डी होने पर बादल बनाती है (संघनन)। बूँदें भारी होकर वर्षा/हिम के रूप में गिरती हैं (वर्षण), और अन्त में जल महासागरों, नदियों और जलभृतों में संगृहीत होता है (संग्रहण) — इस तरह लूप पूर्ण होता है।

स्रोत: Practice Question

Q4. वर्षा जल संग्रहण से सहायता मिलती है:

  • केवल शहरों में बाढ़ बढ़ाने में।
  • भू-जल स्तर को काफी कम करने में।
  • जल संरक्षण और भू-जल स्तर पुनर्भरण में।
  • वर्षा जल को पीने योग्य न बनाने में।

व्याख्या: वर्षा-जल संचयन उस जल को पकड़ लेता है जो अन्यथा बह जाता, उसे सीधे उपयोग हेतु संग्रहित करता है तथा कुछ हिस्से को पुनर्भरण गड्ढों में पहुँचाकर भू-जल स्तर ऊँचा करता है। अतः यह जल-संरक्षण और भू-जल पुनर्भरण दोनों में सहायक है — अन्य विकल्प हानि या विपरीत प्रभाव दर्शाते हैं।

स्रोत: Practice Question

Q5. निम्नलिखित में से कौन राजस्थान का पारंपरिक जल संग्रह संरचना है?

  • बावड़ी
  • जोहड़
  • खड़ीन
  • उपरोक्त सभी

व्याख्या: बावड़ी (सीढ़ीदार कुएँ), जोहड़ (मिट्टी के छोटे चेक बाँध) और खड़ीन (पक्के जलग्रहण वाले निचले खेत-बाँध) — ये तीनों राजस्थान की देसी जल-संग्रह संरचनाएँ हैं, प्रत्येक शुष्क भूभाग के अनुरूप अनुकूलित। अतः 'उपरोक्त सभी' सही उत्तर है।

स्रोत: Practice Question