भाषा-अर्जन एवं भाषा-अधिगम — मूलभूत अंतर
स्टीफ़न क्रैशेन (Stephen Krashen) का प्रसिद्ध भेद:
| विशेषता | भाषा-अर्जन (Acquisition) | भाषा-अधिगम (Learning) |
|---|---|---|
| स्वरूप | अनौपचारिक, अवचेतन | औपचारिक, सचेत |
| स्थान | घर, खेल का मैदान, समुदाय | विद्यालय की कक्षा |
| नियम | नियम पता नहीं, फिर भी सही प्रयोग | नियम याद, फिर भी कठिनाई से प्रयोग |
| उदाहरण | प्रथम भाषा (L1) | विद्यालय की द्वितीय भाषा (L2) |
NIOS 503 का संकेत: बच्चे अपनी मातृभाषा को बिना औपचारिक शिक्षा के पूर्ण रूप से अर्जित कर लेते हैं — यह असाधारण क्षमता है। द्वितीय भाषा भी यदि अर्जन-वातावरण (immersion) में सीखी जाए तो उतनी ही गहरी होती है।
शिक्षण-निहितार्थ: कक्षा में जितनी अर्जन-समान स्थितियाँ बनेंगी (वास्तविक संवाद, अर्थपूर्ण कार्य, खेल, कहानी), उतना ही गहरा भाषा-विकास होगा। केवल नियम-रटन्त ‘अधिगम’ है — सतही।
नोम चॉम्स्की — जन्मजात-वादी (Innatist) दृष्टिकोण
1950 के दशक के अंत में अमेरिकी भाषाविद् नोम चॉम्स्की (Noam Chomsky) ने प्रचलित व्यवहारवादी सिद्धांत का तीव्र खंडन किया। उनका मुख्य तर्क:
- सभी बच्चे, किसी भी संस्कृति-भाषा में, समान आयु-क्रम से भाषा अर्जित करते हैं।
- बच्चे ऐसे वाक्य बोलते हैं जो उन्होंने पहले कभी नहीं सुने (‘ग़रीबी का उत्तेजक’ तर्क — poverty of the stimulus)।
- ‘मैं चलाया’ जैसी सुसंगत त्रुटि (over-generalization) — सिद्ध करती है कि बच्चा नियम बना रहा है, अनुकरण नहीं कर रहा।
इन सबसे चॉम्स्की का निष्कर्ष — ‘बच्चा एक भाषा-अर्जन-यंत्र (Language Acquisition Device — LAD) लेकर पैदा होता है’। यह जैविक तंत्र विश्व की सभी मानव-भाषाओं के लिए एक सार्वभौमिक व्याकरण (Universal Grammar — UG) रखता है। शिशु केवल अपने भाषा-समुदाय के विशिष्ट ‘पैरामीटर’ सेट करता है।
चॉम्स्की का प्रसिद्ध वाक्य: ‘Colorless green ideas sleep furiously.’ — व्याकरणिक रूप से सही पर अर्थहीन — सिद्ध करता है कि व्याकरण अर्थ से स्वतंत्र है।
शिक्षण-निहितार्थ: बच्चे की भाषा-क्षमता को कम न आँकें। बच्चों को ‘समृद्ध भाषा-निवेश’ (rich language input) दें — कहानियाँ, कविताएँ, संवाद — मस्तिष्क स्वयं नियम निकाल लेगा।
बी.एफ. स्किनर — व्यवहारवादी (Behaviorist) दृष्टिकोण
बी.एफ. स्किनर (B.F. Skinner) — व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिक, 1957 की पुस्तक ‘Verbal Behavior’। उनका तर्क:
- भाषा अन्य व्यवहारों की तरह ही सीखी जाती है — उद्दीपन-प्रतिक्रिया-पुनर्बलन (Stimulus-Response-Reinforcement) से।
- बच्चा वयस्क की भाषा का अनुकरण (imitation) करता है।
- सही प्रयोग पर पुनर्बलन (शाबाश, मुस्कान) मिलता है; गलत प्रयोग अनदेखा रहता है।
- धीरे-धीरे ‘आकार-निर्माण (shaping)’ से भाषा-व्यवहार पक्का होता है।
आलोचना (चॉम्स्की 1959 की प्रसिद्ध समीक्षा):
- व्यवहारवाद यह नहीं समझा पाता कि बच्चा कैसे ऐसे वाक्य बना लेता है जो उसने कभी सुने ही नहीं।
- ‘मैं चलाया’ जैसी सुसंगत त्रुटि — माता-पिता ने नहीं सिखाई — पर बच्चे करते हैं।
- बच्चों को सक्रिय रूप से ‘पुनर्बलन’ देने वाले माता-पिता कम ही होते हैं।
व्यवहारवादी विधि का प्रभाव: रटन्त-शिक्षण, पैटर्न-अभ्यास (drill), श्रवण-भाषण विधि (audio-lingual method) इसी से उत्पन्न। एक भाषा-शिक्षण उपकरण के रूप में उपयोगी, पर अर्थ-निर्माण में कमज़ोर।
लेव वायगोत्स्की — सामाजिक-अंतःक्रियावादी (Social-Interactionist)
लेव वायगोत्स्की (Lev Vygotsky, 1896–1934, सोवियत मनोवैज्ञानिक) — का सिद्धांत:
- भाषा सामाजिक उत्पत्ति की है। शिशु पहले पारस्परिक (interpsychological), फिर अंतर-व्यक्तिक (intrapsychological) रूप में भाषा का प्रयोग करता है।
- भाषा चिंतन का उपकरण है। बच्चा पहले ज़ोर से बोलकर सोचता है (‘मुझे यह करना है’), फिर मौन-स्वगत भाषण (inner speech) में बदलता है।
- समीपस्थ विकास का क्षेत्र (ZPD) — बच्चा अकेले जो कर सकता है, और सहायता से जो कर सकता है, उसके बीच का क्षेत्र। शिक्षक/अधिक-ज्ञानी (MKO) से सहायता ZPD में काम करती है।
- ‘पाड़-निर्माण’ (Scaffolding) — आरंभ में अधिक सहायता, फिर धीरे-धीरे हटाना।
जेरोम ब्रूनर (Jerome Bruner) ने वायगोत्स्की के विचार को विस्तार दिया — ‘भाषा-अर्जन सहायक तंत्र (Language Acquisition Support System — LASS)’ — माता-पिता एवं समुदाय का सहयोग ही बच्चे के LAD के साथ काम करता है।
शिक्षण-निहितार्थ (NCF 2005 स्पष्ट समर्थन):
- भाषा-समृद्ध कक्षा बनाएँ — संवाद, समूह-कार्य, कहानी-कथन।
- सहकारी अधिगम (cooperative learning)।
- शिक्षक केवल ज्ञान-दाता नहीं, सहायक।
- बच्चा-से-बच्चा अंतःक्रिया का अवसर।
चार प्रमुख भाषा-शिक्षण विधियाँ
NIOS 503 खंड-1 प्रस्तावना से verbatim — चार विधियाँ:
(1) व्याकरण-अनुवाद विधि (Grammar-Translation Method)
- व्याकरण के नियम याद करवाना + L1 ↔ L2 अनुवाद।
- पठन एवं लेखन-केंद्रित; मौखिक कौशल नहीं।
- भारतीय विद्यालयों की परम्परागत विधि — संस्कृत-अंग्रेज़ी पढ़ाने में आज भी।
- शक्ति: साहित्यिक पठन के लिए उपयुक्त।
- कमज़ोरी: बोलना-सुनना नहीं आता; भाषा का प्राकृतिक प्रयोग नहीं।
(2) प्रत्यक्ष विधि (Direct Method)
- कक्षा में केवल लक्ष्य-भाषा; अनुवाद नहीं।
- शब्द-अर्थ का प्रत्यक्ष संबंध (वस्तु दिखाकर, अभिनय करके)।
- मौखिक कौशल सशक्त।
- शक्ति: भाषा-अर्जन-समान वातावरण।
- कमज़ोरी: अमूर्त विचारों को कठिन; कक्षा-आकार बड़ा होने पर अव्यावहारिक।
(3) श्रवण-भाषण विधि (Audio-Lingual Method)
- पैटर्न-अभ्यास, अनुकरण, स्मरण।
- व्यवहारवादी जड़ें (स्किनर)।
- उच्चारण एवं वाक्य-संरचना में सशक्त।
- शक्ति: स्वचालित प्रयोग।
- कमज़ोरी: अर्थ-निर्माण में कमज़ोर; रचनात्मक प्रयोग नहीं।
(4) सम्प्रेषणात्मक उपागम (Communicative Approach) — NCF 2005 की अनुशंसित विधि
- भाषा एक सम्प्रेषण का उपकरण; अर्थ, प्रयोजन, वास्तविक कार्य पर ज़ोर।
- ‘भाषा का प्रयोग करते-करते भाषा सीखो’ (learn by doing)।
- सूचना-अंतराल (information gap) कार्य; भूमिका-अभिनय; समस्या-समाधान।
- व्याकरण अंतर्निहित — स्वयं नियम खोजें।
- शक्ति: वास्तविक प्रयोग; प्रेरणा अधिक।
- कमज़ोरी: उच्चारण-त्रुटियाँ आरंभ में अधिक; शिक्षक-कौशल पर अधिक निर्भर।
प्रथम भाषा (L1) एवं द्वितीय भाषा (L2)
प्रथम भाषा (L1) — जन्म से जो भाषा बच्चा अपने परिवार-समुदाय से अर्जित करे; ‘मातृभाषा’। L1 अधिगम कुछ विशेष विशेषताएँ रखता है:
- अनौपचारिक, सतत संपर्क।
- ‘कमज़ोर निवेश’ से भी पूर्ण अर्जन — चॉम्स्की का LAD तर्क।
- उच्चारण मातृभाषा-सम।
- 3–4 वर्ष में मुख्य व्याकरण पूर्ण।
द्वितीय भाषा (L2) — बाद में सीखी गई भाषा; प्रायः विद्यालय में। L2 अधिगम विशेषताएँ:
- औपचारिक संदर्भ अधिक।
- L1 का प्रभाव L2 के उच्चारण/व्याकरण/शब्दावली पर — ‘L1 हस्तक्षेप’ (L1 interference)।
- ‘क्रिटिकल पीरियड’ परिकल्पना (एरिक लेनबर्ग) — किशोरावस्था के बाद ‘मातृ-समकक्ष’ L2 अर्जन कठिन।
- व्यक्तिगत अंतर अधिक — प्रेरणा, आयु, अवसर निर्णायक।
NCF 2005 + NEP 2020 की अनुशंसा: कक्षा-5 तक मातृभाषा-माध्यम; उसके बाद बहुभाषिक संदर्भ। L1 में सीखी अवधारणाएँ L2 में स्थानांतरित होती हैं (Cummins की ‘कॉमन अंडरलाइंग प्रोफ़िशियेन्सी’ परिकल्पना)।
‘L1 के नष्ट होने पर’ खतरा: यदि बच्चा L1 छोड़ देता है तो वह ‘दो-भाषी अल्प-दक्ष’ (subtractive bilingualism) हो जाता है — यह संज्ञानात्मक हानि है।
बहुभाषिकता एवं भारतीय कक्षा
भारत के लगभग सभी बच्चे बहुभाषी पृष्ठभूमि से आते हैं — घर पर बोली, गाँव में क्षेत्रीय भाषा, विद्यालय में मानक हिंदी, फिर अंग्रेज़ी। यह संसाधन है, समस्या नहीं।
NIOS 503 खंड-1 इकाई-2 ‘भारतीय भाषाएँ’ कहती है — भारत में 22 भाषाएँ संविधान-सूची में, 1,652 मातृभाषाएँ जनगणना में दर्ज (1961, अंतिम पूर्ण भाषा-सर्वेक्षण), 121 भाषाएँ 10,000+ बोलने वाले रखती हैं।
शिक्षण-संकेत बहुभाषी कक्षा में:
- कोड-स्विचिंग सहज मानें — बच्चे यदि कक्षा में हिंदी-अंग्रेज़ी मिश्रित बोलते हैं, यह अधिगम-असफलता नहीं, संज्ञानात्मक लचीलापन है।
- L1-L2 सेतु बनाएँ — मातृभाषा में अवधारणा स्पष्ट करें, फिर हिंदी शब्दावली जोड़ें।
- स्थानीय बोली का सम्मान — अवधी, भोजपुरी, मगही, छत्तीसगढ़ी आदि की कविताएँ-कहानियाँ पाठ्यक्रम में स्थान।
- अनुवाद-गतिविधि — एक ही कहानी मातृभाषा एवं हिंदी में सुनना।
‘तीन-भाषा सूत्र’ (NCF 2005): कम-से-कम तीन भाषाएँ — मातृभाषा, क्षेत्रीय/पड़ोसी, अंग्रेज़ी/अन्य। राज्यों के अनुसार लचीला कार्यान्वयन।
विधि-पहचान — CTET-PYQ संकेत
CTET में अक्सर एक कक्षा-दृश्य देकर ‘यह कौन सी विधि है?’ पूछा जाता है। पहचान-संकेत:
| दृश्य का विवरण | विधि |
|---|---|
| बच्चे एक कहानी पढ़कर हिंदी से अंग्रेज़ी में अनुवाद कर रहे; शिक्षक नियम लिख रहा है। | व्याकरण-अनुवाद विधि |
| शिक्षक केवल अंग्रेज़ी (लक्ष्य-भाषा) बोल रहा; वस्तु दिखाकर शब्द-अर्थ बता रहा। | प्रत्यक्ष विधि |
| बच्चे एक ही वाक्य-संरचना (‘यह क़लम है, यह किताब है…’) बार-बार दोहरा रहे। | श्रवण-भाषण विधि |
| बच्चे एक रेस्तराँ-दृश्य का अभिनय कर रहे; ग्राहक एवं वेटर भूमिका; कोई पूर्व-निर्धारित संवाद नहीं। | सम्प्रेषणात्मक विधि |
| बच्चे ‘अधूरा सूचना-कार्ड’ भर रहे — एक के पास A का चित्र, दूसरे के पास B; पूछ-पूछ कर जानना। | सम्प्रेषणात्मक विधि (information-gap) |
सिद्धांतकार-सिद्धांत मिलान:
- नोम चॉम्स्की → LAD, सार्वभौमिक व्याकरण, जन्मजात-वाद।
- बी.एफ. स्किनर → व्यवहारवाद, उद्दीपन-प्रतिक्रिया, ‘Verbal Behavior’।
- लेव वायगोत्स्की → सामाजिक-अंतःक्रिया, ZPD, स्वगत-भाषण।
- जेरोम ब्रूनर → LASS, पाड़-निर्माण।
- स्टीफ़न क्रैशेन → अर्जन-अधिगम भेद, ‘बोधगम्य निवेश’ (i+1) परिकल्पना।
- एरिक लेनबर्ग → क्रिटिकल पीरियड परिकल्पना।
अभ्यास प्रश्न
Q1. ‘बच्चे भाषा-अर्जन-यन्त्र (LAD) एवं सार्वभौमिक व्याकरण लेकर पैदा होते हैं’ — यह विचार किस सिद्धांतकार का है?
व्याख्या: नोम चॉम्स्की (1957–59) — जन्मजात-वादी दृष्टिकोण। बच्चा जैविक रूप से LAD लेकर पैदा होता है जो सार्वभौमिक व्याकरण रखता है। स्किनर व्यवहारवादी; वायगोत्स्की सामाजिक-अंतःक्रियावादी; ब्रूनर LASS (Language Acquisition Support System) के समर्थक। उत्तर (3)।
स्रोत: Practice (NIOS 503 खंड-1 इकाई-3)
Q2. एक भाषा-कक्षा में शिक्षक केवल लक्ष्य-भाषा बोलते हुए वस्तु-प्रदर्शन एवं अभिनय से शब्द-अर्थ स्पष्ट करते हैं, अनुवाद नहीं करते। यह कौन सी शिक्षण विधि है?
व्याख्या: ‘प्रत्यक्ष विधि (Direct Method)’ — कक्षा में केवल लक्ष्य-भाषा; वस्तु, चित्र, अभिनय से शब्द-अर्थ का प्रत्यक्ष संबंध; अनुवाद नहीं। बर्लिट्ज़ (Berlitz) इसकी प्रसिद्ध पाठशाला है। NIOS 503 खंड-1 प्रस्तावना। उत्तर (2)।
स्रोत: Practice (NIOS 503 खंड-1 इकाई-3)
Q3. NCF 2005 के अनुसार भाषा-शिक्षण की अनुशंसित विधि कौन सी है?
व्याख्या: NCF 2005 भाषा-स्थिति-पत्र सम्प्रेषणात्मक उपागम (Communicative Approach) की स्पष्ट अनुशंसा करता है — भाषा को ‘प्रयोग करते-करते’ सीखो। नियम-रटन्त नहीं; अर्थ-निर्माण एवं वास्तविक संदर्भ। उत्तर (4)।
स्रोत: Practice (NCF 2005)
Q4. ‘समीपस्थ विकास का क्षेत्र (ZPD)’ की अवधारणा किस सिद्धांतकार से जुड़ी है?
व्याख्या: ZPD — समीपस्थ विकास का क्षेत्र — लेव वायगोत्स्की की केन्द्रीय अवधारणा। बच्चा अकेले जो कर सकता है, और सहायता से जो कर सकता है — उसके बीच का क्षेत्र। शिक्षक का काम ZPD में ‘पाड़-निर्माण’ देना है। उत्तर (3)।
स्रोत: Practice (NIOS 503; CDP-07)
Q5. बच्चे का यह कथन — ‘मैं कल बाज़ार चलाया’ — सबसे अधिक किसका प्रमाण है?
व्याख्या: ‘चलाया’ — ‘सुसंगत अति-सामान्यीकरण (over-generalization)’ — बच्चा ‘खाना → खाया, सोना → सोया’ नियम से ‘चलना → चलाया’ बना रहा है। यह नियम-निर्माण की क्षमता सिद्ध करता है — चॉम्स्की का LAD-तर्क। न पिछड़ापन, न अनुकरण, न पुनर्बलन-कमी। NCF 2005 + NIOS 503 ‘त्रुटियाँ अधिगम के सोपान’ इस ओर इंगित करते हैं। उत्तर (2)।
स्रोत: Practice (NIOS 503 खंड-2 प्रस्तावना)