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भाषा अधिगम एवं अर्जन | CTET हिंदी

‘बच्चे भाषा सीखने की अनंत क्षमता लेकर पैदा होते हैं और तीन-चार साल की ही उम्र में भाषा समझने व बोलने में निपुण हो जाते हैं… क्या वे एक सार्वभौमिक व्याकरण लेकर पैदा होते हैं?’ — NIOS 503 खंड-1 इकाई-3 का यह verbatim कथन ही भाषा-अधिगम के दार्शनिक प्रश्न को सामने रखता है। यह विषय बच्चे की भाषा-क्षमता के सिद्धांतों (व्यवहारवादी, जन्मजात-वादी, सामाजिक-अंतःक्रियावादी), अर्जन बनाम अधिगम के अंतर, तथा चार मुख्य भाषा-शिक्षण विधियों पर केंद्रित है। CTET पेपर 1 एवं 2 के हिंदी-विकल्प में इस अध्याय से 4–6 प्रश्न आते हैं — विशेषकर सिद्धांतकार-सिद्धांत मिलान, दृश्य से विधि-पहचान, NCF 2005 की अनुशंसित विधि पर।

HINDI — भाषा अधिगम

भाषा-अर्जन एवं भाषा-अधिगम — मूलभूत अंतर

स्टीफ़न क्रैशेन (Stephen Krashen) का प्रसिद्ध भेद:

विशेषताभाषा-अर्जन (Acquisition)भाषा-अधिगम (Learning)
स्वरूपअनौपचारिक, अवचेतनऔपचारिक, सचेत
स्थानघर, खेल का मैदान, समुदायविद्यालय की कक्षा
नियमनियम पता नहीं, फिर भी सही प्रयोगनियम याद, फिर भी कठिनाई से प्रयोग
उदाहरणप्रथम भाषा (L1)विद्यालय की द्वितीय भाषा (L2)

NIOS 503 का संकेत: बच्चे अपनी मातृभाषा को बिना औपचारिक शिक्षा के पूर्ण रूप से अर्जित कर लेते हैं — यह असाधारण क्षमता है। द्वितीय भाषा भी यदि अर्जन-वातावरण (immersion) में सीखी जाए तो उतनी ही गहरी होती है।

शिक्षण-निहितार्थ: कक्षा में जितनी अर्जन-समान स्थितियाँ बनेंगी (वास्तविक संवाद, अर्थपूर्ण कार्य, खेल, कहानी), उतना ही गहरा भाषा-विकास होगा। केवल नियम-रटन्त ‘अधिगम’ है — सतही।

नोम चॉम्स्की — जन्मजात-वादी (Innatist) दृष्टिकोण

1950 के दशक के अंत में अमेरिकी भाषाविद् नोम चॉम्स्की (Noam Chomsky) ने प्रचलित व्यवहारवादी सिद्धांत का तीव्र खंडन किया। उनका मुख्य तर्क:

  • सभी बच्चे, किसी भी संस्कृति-भाषा में, समान आयु-क्रम से भाषा अर्जित करते हैं।
  • बच्चे ऐसे वाक्य बोलते हैं जो उन्होंने पहले कभी नहीं सुने (‘ग़रीबी का उत्तेजक’ तर्क — poverty of the stimulus)।
  • ‘मैं चलाया’ जैसी सुसंगत त्रुटि (over-generalization) — सिद्ध करती है कि बच्चा नियम बना रहा है, अनुकरण नहीं कर रहा।

इन सबसे चॉम्स्की का निष्कर्ष — ‘बच्चा एक भाषा-अर्जन-यंत्र (Language Acquisition Device — LAD) लेकर पैदा होता है’। यह जैविक तंत्र विश्व की सभी मानव-भाषाओं के लिए एक सार्वभौमिक व्याकरण (Universal Grammar — UG) रखता है। शिशु केवल अपने भाषा-समुदाय के विशिष्ट ‘पैरामीटर’ सेट करता है।

चॉम्स्की का प्रसिद्ध वाक्य: ‘Colorless green ideas sleep furiously.’ — व्याकरणिक रूप से सही पर अर्थहीन — सिद्ध करता है कि व्याकरण अर्थ से स्वतंत्र है।

शिक्षण-निहितार्थ: बच्चे की भाषा-क्षमता को कम न आँकें। बच्चों को ‘समृद्ध भाषा-निवेश’ (rich language input) दें — कहानियाँ, कविताएँ, संवाद — मस्तिष्क स्वयं नियम निकाल लेगा।

बी.एफ. स्किनर — व्यवहारवादी (Behaviorist) दृष्टिकोण

बी.एफ. स्किनर (B.F. Skinner) — व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिक, 1957 की पुस्तक ‘Verbal Behavior’। उनका तर्क:

  • भाषा अन्य व्यवहारों की तरह ही सीखी जाती है — उद्दीपन-प्रतिक्रिया-पुनर्बलन (Stimulus-Response-Reinforcement) से।
  • बच्चा वयस्क की भाषा का अनुकरण (imitation) करता है।
  • सही प्रयोग पर पुनर्बलन (शाबाश, मुस्कान) मिलता है; गलत प्रयोग अनदेखा रहता है।
  • धीरे-धीरे ‘आकार-निर्माण (shaping)’ से भाषा-व्यवहार पक्का होता है।

आलोचना (चॉम्स्की 1959 की प्रसिद्ध समीक्षा):

  • व्यवहारवाद यह नहीं समझा पाता कि बच्चा कैसे ऐसे वाक्य बना लेता है जो उसने कभी सुने ही नहीं।
  • ‘मैं चलाया’ जैसी सुसंगत त्रुटि — माता-पिता ने नहीं सिखाई — पर बच्चे करते हैं।
  • बच्चों को सक्रिय रूप से ‘पुनर्बलन’ देने वाले माता-पिता कम ही होते हैं।

व्यवहारवादी विधि का प्रभाव: रटन्त-शिक्षण, पैटर्न-अभ्यास (drill), श्रवण-भाषण विधि (audio-lingual method) इसी से उत्पन्न। एक भाषा-शिक्षण उपकरण के रूप में उपयोगी, पर अर्थ-निर्माण में कमज़ोर।

लेव वायगोत्स्की — सामाजिक-अंतःक्रियावादी (Social-Interactionist)

लेव वायगोत्स्की (Lev Vygotsky, 1896–1934, सोवियत मनोवैज्ञानिक) — का सिद्धांत:

  • भाषा सामाजिक उत्पत्ति की है। शिशु पहले पारस्परिक (interpsychological), फिर अंतर-व्यक्तिक (intrapsychological) रूप में भाषा का प्रयोग करता है।
  • भाषा चिंतन का उपकरण है। बच्चा पहले ज़ोर से बोलकर सोचता है (‘मुझे यह करना है’), फिर मौन-स्वगत भाषण (inner speech) में बदलता है।
  • समीपस्थ विकास का क्षेत्र (ZPD) — बच्चा अकेले जो कर सकता है, और सहायता से जो कर सकता है, उसके बीच का क्षेत्र। शिक्षक/अधिक-ज्ञानी (MKO) से सहायता ZPD में काम करती है।
  • ‘पाड़-निर्माण’ (Scaffolding) — आरंभ में अधिक सहायता, फिर धीरे-धीरे हटाना।

जेरोम ब्रूनर (Jerome Bruner) ने वायगोत्स्की के विचार को विस्तार दिया — ‘भाषा-अर्जन सहायक तंत्र (Language Acquisition Support System — LASS)’ — माता-पिता एवं समुदाय का सहयोग ही बच्चे के LAD के साथ काम करता है।

शिक्षण-निहितार्थ (NCF 2005 स्पष्ट समर्थन):

  • भाषा-समृद्ध कक्षा बनाएँ — संवाद, समूह-कार्य, कहानी-कथन।
  • सहकारी अधिगम (cooperative learning)।
  • शिक्षक केवल ज्ञान-दाता नहीं, सहायक।
  • बच्चा-से-बच्चा अंतःक्रिया का अवसर।

चार प्रमुख भाषा-शिक्षण विधियाँ

NIOS 503 खंड-1 प्रस्तावना से verbatim — चार विधियाँ:

(1) व्याकरण-अनुवाद विधि (Grammar-Translation Method)

  • व्याकरण के नियम याद करवाना + L1 ↔ L2 अनुवाद।
  • पठन एवं लेखन-केंद्रित; मौखिक कौशल नहीं।
  • भारतीय विद्यालयों की परम्परागत विधि — संस्कृत-अंग्रेज़ी पढ़ाने में आज भी।
  • शक्ति: साहित्यिक पठन के लिए उपयुक्त।
  • कमज़ोरी: बोलना-सुनना नहीं आता; भाषा का प्राकृतिक प्रयोग नहीं।

(2) प्रत्यक्ष विधि (Direct Method)

  • कक्षा में केवल लक्ष्य-भाषा; अनुवाद नहीं।
  • शब्द-अर्थ का प्रत्यक्ष संबंध (वस्तु दिखाकर, अभिनय करके)।
  • मौखिक कौशल सशक्त।
  • शक्ति: भाषा-अर्जन-समान वातावरण।
  • कमज़ोरी: अमूर्त विचारों को कठिन; कक्षा-आकार बड़ा होने पर अव्यावहारिक।

(3) श्रवण-भाषण विधि (Audio-Lingual Method)

  • पैटर्न-अभ्यास, अनुकरण, स्मरण।
  • व्यवहारवादी जड़ें (स्किनर)।
  • उच्चारण एवं वाक्य-संरचना में सशक्त।
  • शक्ति: स्वचालित प्रयोग।
  • कमज़ोरी: अर्थ-निर्माण में कमज़ोर; रचनात्मक प्रयोग नहीं।

(4) सम्प्रेषणात्मक उपागम (Communicative Approach)NCF 2005 की अनुशंसित विधि

  • भाषा एक सम्प्रेषण का उपकरण; अर्थ, प्रयोजन, वास्तविक कार्य पर ज़ोर।
  • ‘भाषा का प्रयोग करते-करते भाषा सीखो’ (learn by doing)।
  • सूचना-अंतराल (information gap) कार्य; भूमिका-अभिनय; समस्या-समाधान।
  • व्याकरण अंतर्निहित — स्वयं नियम खोजें।
  • शक्ति: वास्तविक प्रयोग; प्रेरणा अधिक।
  • कमज़ोरी: उच्चारण-त्रुटियाँ आरंभ में अधिक; शिक्षक-कौशल पर अधिक निर्भर।

प्रथम भाषा (L1) एवं द्वितीय भाषा (L2)

प्रथम भाषा (L1) — जन्म से जो भाषा बच्चा अपने परिवार-समुदाय से अर्जित करे; ‘मातृभाषा’। L1 अधिगम कुछ विशेष विशेषताएँ रखता है:

  • अनौपचारिक, सतत संपर्क।
  • ‘कमज़ोर निवेश’ से भी पूर्ण अर्जन — चॉम्स्की का LAD तर्क।
  • उच्चारण मातृभाषा-सम।
  • 3–4 वर्ष में मुख्य व्याकरण पूर्ण।

द्वितीय भाषा (L2) — बाद में सीखी गई भाषा; प्रायः विद्यालय में। L2 अधिगम विशेषताएँ:

  • औपचारिक संदर्भ अधिक।
  • L1 का प्रभाव L2 के उच्चारण/व्याकरण/शब्दावली पर — ‘L1 हस्तक्षेप’ (L1 interference)।
  • क्रिटिकल पीरियड’ परिकल्पना (एरिक लेनबर्ग) — किशोरावस्था के बाद ‘मातृ-समकक्ष’ L2 अर्जन कठिन।
  • व्यक्तिगत अंतर अधिक — प्रेरणा, आयु, अवसर निर्णायक।

NCF 2005 + NEP 2020 की अनुशंसा: कक्षा-5 तक मातृभाषा-माध्यम; उसके बाद बहुभाषिक संदर्भ। L1 में सीखी अवधारणाएँ L2 में स्थानांतरित होती हैं (Cummins की ‘कॉमन अंडरलाइंग प्रोफ़िशियेन्सी’ परिकल्पना)।

L1 के नष्ट होने पर’ खतरा: यदि बच्चा L1 छोड़ देता है तो वह ‘दो-भाषी अल्प-दक्ष’ (subtractive bilingualism) हो जाता है — यह संज्ञानात्मक हानि है।

बहुभाषिकता एवं भारतीय कक्षा

भारत के लगभग सभी बच्चे बहुभाषी पृष्ठभूमि से आते हैं — घर पर बोली, गाँव में क्षेत्रीय भाषा, विद्यालय में मानक हिंदी, फिर अंग्रेज़ी। यह संसाधन है, समस्या नहीं।

NIOS 503 खंड-1 इकाई-2 ‘भारतीय भाषाएँ’ कहती है — भारत में 22 भाषाएँ संविधान-सूची में, 1,652 मातृभाषाएँ जनगणना में दर्ज (1961, अंतिम पूर्ण भाषा-सर्वेक्षण), 121 भाषाएँ 10,000+ बोलने वाले रखती हैं।

शिक्षण-संकेत बहुभाषी कक्षा में:

  • कोड-स्विचिंग सहज मानें — बच्चे यदि कक्षा में हिंदी-अंग्रेज़ी मिश्रित बोलते हैं, यह अधिगम-असफलता नहीं, संज्ञानात्मक लचीलापन है।
  • L1-L2 सेतु बनाएँ — मातृभाषा में अवधारणा स्पष्ट करें, फिर हिंदी शब्दावली जोड़ें।
  • स्थानीय बोली का सम्मान — अवधी, भोजपुरी, मगही, छत्तीसगढ़ी आदि की कविताएँ-कहानियाँ पाठ्यक्रम में स्थान।
  • अनुवाद-गतिविधि — एक ही कहानी मातृभाषा एवं हिंदी में सुनना।

‘तीन-भाषा सूत्र’ (NCF 2005): कम-से-कम तीन भाषाएँ — मातृभाषा, क्षेत्रीय/पड़ोसी, अंग्रेज़ी/अन्य। राज्यों के अनुसार लचीला कार्यान्वयन।

विधि-पहचान — CTET-PYQ संकेत

CTET में अक्सर एक कक्षा-दृश्य देकर ‘यह कौन सी विधि है?’ पूछा जाता है। पहचान-संकेत:

दृश्य का विवरणविधि
बच्चे एक कहानी पढ़कर हिंदी से अंग्रेज़ी में अनुवाद कर रहे; शिक्षक नियम लिख रहा है।व्याकरण-अनुवाद विधि
शिक्षक केवल अंग्रेज़ी (लक्ष्य-भाषा) बोल रहा; वस्तु दिखाकर शब्द-अर्थ बता रहा।प्रत्यक्ष विधि
बच्चे एक ही वाक्य-संरचना (‘यह क़लम है, यह किताब है…’) बार-बार दोहरा रहे।श्रवण-भाषण विधि
बच्चे एक रेस्तराँ-दृश्य का अभिनय कर रहे; ग्राहक एवं वेटर भूमिका; कोई पूर्व-निर्धारित संवाद नहीं।सम्प्रेषणात्मक विधि
बच्चे ‘अधूरा सूचना-कार्ड’ भर रहे — एक के पास A का चित्र, दूसरे के पास B; पूछ-पूछ कर जानना।सम्प्रेषणात्मक विधि (information-gap)

सिद्धांतकार-सिद्धांत मिलान:

  • नोम चॉम्स्की → LAD, सार्वभौमिक व्याकरण, जन्मजात-वाद।
  • बी.एफ. स्किनर → व्यवहारवाद, उद्दीपन-प्रतिक्रिया, ‘Verbal Behavior’।
  • लेव वायगोत्स्की → सामाजिक-अंतःक्रिया, ZPD, स्वगत-भाषण।
  • जेरोम ब्रूनर → LASS, पाड़-निर्माण।
  • स्टीफ़न क्रैशेन → अर्जन-अधिगम भेद, ‘बोधगम्य निवेश’ (i+1) परिकल्पना।
  • एरिक लेनबर्ग → क्रिटिकल पीरियड परिकल्पना।
CTET-संकेत: ‘अर्थ-निर्माण’, ‘वास्तविक प्रयोग’, ‘बहुभाषिकता संसाधन’, ‘L1-L2 सेतु’ — चार कीवर्ड NCF 2005-संरेखित सही उत्तरों की पहचान देते हैं।

अभ्यास प्रश्न

Q1. ‘बच्चे भाषा-अर्जन-यन्त्र (LAD) एवं सार्वभौमिक व्याकरण लेकर पैदा होते हैं’ — यह विचार किस सिद्धांतकार का है?

  • बी.एफ. स्किनर
  • लेव वायगोत्स्की
  • नोम चॉम्स्की
  • जेरोम ब्रूनर

व्याख्या: नोम चॉम्स्की (1957–59) — जन्मजात-वादी दृष्टिकोण। बच्चा जैविक रूप से LAD लेकर पैदा होता है जो सार्वभौमिक व्याकरण रखता है। स्किनर व्यवहारवादी; वायगोत्स्की सामाजिक-अंतःक्रियावादी; ब्रूनर LASS (Language Acquisition Support System) के समर्थक। उत्तर (3)।

स्रोत: Practice (NIOS 503 खंड-1 इकाई-3)

Q2. एक भाषा-कक्षा में शिक्षक केवल लक्ष्य-भाषा बोलते हुए वस्तु-प्रदर्शन एवं अभिनय से शब्द-अर्थ स्पष्ट करते हैं, अनुवाद नहीं करते। यह कौन सी शिक्षण विधि है?

  • व्याकरण-अनुवाद विधि
  • प्रत्यक्ष विधि
  • श्रवण-भाषण विधि
  • सम्प्रेषणात्मक उपागम

व्याख्या:प्रत्यक्ष विधि (Direct Method)’ — कक्षा में केवल लक्ष्य-भाषा; वस्तु, चित्र, अभिनय से शब्द-अर्थ का प्रत्यक्ष संबंध; अनुवाद नहीं। बर्लिट्ज़ (Berlitz) इसकी प्रसिद्ध पाठशाला है। NIOS 503 खंड-1 प्रस्तावना। उत्तर (2)।

स्रोत: Practice (NIOS 503 खंड-1 इकाई-3)

Q3. NCF 2005 के अनुसार भाषा-शिक्षण की अनुशंसित विधि कौन सी है?

  • व्याकरण-अनुवाद विधि
  • प्रत्यक्ष विधि
  • श्रवण-भाषण विधि
  • सम्प्रेषणात्मक उपागम

व्याख्या: NCF 2005 भाषा-स्थिति-पत्र सम्प्रेषणात्मक उपागम (Communicative Approach) की स्पष्ट अनुशंसा करता है — भाषा को ‘प्रयोग करते-करते’ सीखो। नियम-रटन्त नहीं; अर्थ-निर्माण एवं वास्तविक संदर्भ। उत्तर (4)।

स्रोत: Practice (NCF 2005)

Q4. ‘समीपस्थ विकास का क्षेत्र (ZPD)’ की अवधारणा किस सिद्धांतकार से जुड़ी है?

  • नोम चॉम्स्की
  • जीन पियाजे
  • लेव वायगोत्स्की
  • बी.एफ. स्किनर

व्याख्या: ZPD — समीपस्थ विकास का क्षेत्रलेव वायगोत्स्की की केन्द्रीय अवधारणा। बच्चा अकेले जो कर सकता है, और सहायता से जो कर सकता है — उसके बीच का क्षेत्र। शिक्षक का काम ZPD में ‘पाड़-निर्माण’ देना है। उत्तर (3)।

स्रोत: Practice (NIOS 503; CDP-07)

Q5. बच्चे का यह कथन — ‘मैं कल बाज़ार चलाया’ — सबसे अधिक किसका प्रमाण है?

  • बच्चा भाषा सीखने में पिछड़ा है।
  • बच्चा नियम सक्रिय रूप से बना रहा है, केवल अनुकरण नहीं कर रहा।
  • बच्चे ने ‘चलाया’ शब्द किसी से सुना है।
  • बच्चे को पुनर्बलन की कमी है।

व्याख्या: ‘चलाया’ — ‘सुसंगत अति-सामान्यीकरण (over-generalization)’ — बच्चा ‘खाना → खाया, सोना → सोया’ नियम से ‘चलना → चलाया’ बना रहा है। यह नियम-निर्माण की क्षमता सिद्ध करता है — चॉम्स्की का LAD-तर्क। न पिछड़ापन, न अनुकरण, न पुनर्बलन-कमी। NCF 2005 + NIOS 503 ‘त्रुटियाँ अधिगम के सोपान’ इस ओर इंगित करते हैं। उत्तर (2)।

स्रोत: Practice (NIOS 503 खंड-2 प्रस्तावना)