गणित की पाँच विशेषताएँ
NIOS 504 (इकाई 2) गणित की पाँच मूलभूत विशेषताओं की पहचान करती है जो गणित की प्रकृति को परिभाषित करती हैं। ये मिलकर बताती हैं कि गणित इतिहास या साहित्य से अलग क्यों व्यवहार करता है — और इसे एक अलग शिक्षण-शास्त्र की आवश्यकता क्यों है।
1. गणित तार्किक है। हर गणितीय कथन को स्वीकृत नियमों और परिभाषाओं के आधार पर सिद्ध या असिद्ध किया जा सकता है। दो प्रकार का तर्क कार्य करता है: निगमनात्मक तर्क — सामान्य नियम से विशेष निष्कर्ष निकालना (जैसे 'सभी सम संख्याएँ 2 से विभाज्य हैं' से 48 के बारे में सिद्ध करना) — और आगमनात्मक तर्क — अनेक विशेष अवलोकनों से सामान्य नियम तक पहुँचना (जैसे दर्जनों त्रिभुजों के कोण मापकर निष्कर्ष निकालना कि उनका योग सदा 180° होता है)।
2. गणित प्रतीकात्मक है। संख्याएँ (1, 2, 3…), संक्रिया-चिह्न (+, −, ×, ÷), ज्यामितीय आकृतियाँ, अज्ञात के लिए अक्षर — ये सभी प्रतीक हैं। जटिल विचार को संक्षिप्त प्रतीकात्मक रूप में व्यक्त करने से वह सटीक और सार्वभौमिक रूप से समझने योग्य हो जाता है। समीकरण a² + b² = c² पाइथागोरस के प्रमेय को अनेक गद्य-अनुच्छेदों से अधिक कुशलता से एन्कोड करता है।
3. गणित परिशुद्ध है। परिशुद्धता का अर्थ है — बिना किसी अस्पष्टता के सटीकता। हर गणितीय परिभाषा एक स्पष्ट सीमा खींचती है — त्रिभुज की ठीक तीन भुजाएँ होती हैं, 'लगभग तीन' नहीं। C. J. Keyser ने लिखा कि गणितीय चिंतन 'परिशुद्धता, तीक्ष्णता और पूर्णता' से परिलक्षित होता है। गणित सीखने से बच्चे सोच में सटीकता और निर्णय में परिपक्वता का अभ्यास करते हैं।
4. गणित संरचनाओं का अध्ययन है। संरचना का अर्थ है — व्यवस्था, क्रम, विन्यास। प्राकृत संख्याएँ ⊂ पूर्ण संख्याएँ ⊂ पूर्णांक ⊂ परिमेय संख्याएँ — यह एक संरचनात्मक संबंध है। संरचना समझने से छात्र विषय के विभिन्न पहलुओं के बीच संबंध देख पाते हैं।
5. गणित अमूर्तता की ओर अग्रसर है। अमूर्तता का अर्थ है — अनेक विशेष उदाहरणों में सामान्य प्रतिरूप पहचानना और अप्रासंगिक विवरण अनदेखे करना। 'त्रिभुज' की अवधारणा तीन असंरेखीय बिंदुओं और तीन रेखाखंडों को अमूर्त करती है — रंग, आकार या सामग्री से निरपेक्ष। L. Bers ने कहा: 'गणित की शक्ति अमूर्तता में है, किंतु अमूर्तता तभी उपयोगी है जब वह अनेक विशेष स्थितियों को समाहित करे।'
संकुचित उद्देश्य बनाम व्यापक उद्देश्य — NCF 2005
NCF 2005 का गणित पर स्थिति-पत्र विद्यालयी गणित के दो उद्देश्यों के बीच एक महत्त्वपूर्ण अंतर स्पष्ट करता है — एक अंतर जो पाठ्यक्रम-निर्माण, कक्षा-अभ्यास और आकलन सभी को प्रभावित करता है।
संकुचित उद्देश्य है — उपयोगी गणितीय योग्यताएँ विकसित करना: संख्या-ज्ञान, चारों संक्रियाएँ, भिन्न, दशमलव, प्रतिशत, मापन, आधारभूत ज्यामिति और आँकड़ों का प्रबन्धन। ये वे योग्यताएँ हैं जिनकी व्यक्ति को रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ज़रूरत है — बाज़ार में सही भुगतान करना, बस का समय पढ़ना, ब्याज की गणना करना।
व्यापक उद्देश्य है — गणितीयकरण — बच्चों में गणितीय ढंग से सोचने की क्षमता विकसित करना। इसमें शामिल है:
• समस्या-समाधान और हेयुरिस्टिक्स का उपयोग
• अनुमान एवं सन्निकटन
• दृश्यावलोकन और स्थानिक तर्क
• अनेक रूपों में निरूपण
• तर्क और प्रमाण
• गणितीय संप्रेषण
• गणित की सुंदरता के प्रति सौन्दर्यबोध
NCF 2005 में उद्धृत डेविड व्हीलर का कथन व्यापक उद्देश्य को यादगार ढंग से व्यक्त करता है: "गणित का एक बड़ा भंडार जानने से अधिक उपयोगी है यह जानना कि गणितीयकरण कैसे किया जाए।" जो बच्चा गणितीयकरण कर सकता है, वह विज्ञान, अर्थशास्त्र या दैनिक जीवन की नई समस्या उठाकर उसका रास्ता निकाल सकता है। जिसने केवल प्रक्रियाएँ सीखी हैं, वह केवल वे प्रश्न हल कर सकता है जो उसे दिखाए गए हैं।
CTET प्रश्न अक्सर परखते हैं कि क्या अभ्यर्थी इन दोनों स्तरों में अंतर कर सकता है और इसे कक्षा-परिदृश्यों पर लागू कर सकता है।
NCF 2005 — गणित शिक्षा की पाँच दृष्टियाँ
NCF 2005 गणित शिक्षा के लिए पाँच विशिष्ट दृष्टियाँ प्रस्तुत करती है — उत्कृष्ट गणित-शिक्षा कैसी दिखती है। हर कक्षा-गतिविधि की परीक्षा इन पाँच लक्ष्यों से की जा सकती है।
- बच्चे गणित का आनंद लें। डरें नहीं, झेलें नहीं — आनंद लें। जो बच्चा गणित में आनंद पाता है, वह उसे खोजेगा। यह दृष्टि भारतीय विद्यालयों में व्याप्त गणित-भय की वास्तविकता के सीधे विरोध में खड़ी है।
- बच्चे महत्त्वपूर्ण गणित सीखें। महत्त्वपूर्ण का अर्थ है — वैचारिक रूप से समृद्ध — यह समझना कि कब और कैसे कोई विधि काम करती है, न कि केवल यांत्रिक रूप से प्रक्रिया निष्पादित करना।
- बच्चे गणित को बात करने, संप्रेषित करने, चर्चा करने और मिलकर काम करने की वस्तु मानें। गणित एक मौन, एकल गतिविधि नहीं है। बच्चों को तर्क करना चाहिए, अपनी विधियाँ समझानी चाहिए और एक-दूसरे की खोजों का जश्न मनाना चाहिए।
- बच्चे सार्थक समस्याएँ उत्पन्न करें और हल करें। समस्या उत्पन्न करना — किसी स्थिति से प्रश्न बनाना — समस्या हल करने जितना ही महत्त्वपूर्ण है।
- बच्चे संबंधों को देखने, तार्किक ढंग से तर्क करने और सत्य या असत्य का तर्क करने में अमूर्तता का उपयोग करें। यह गणितीय चिंतन की पूर्ण अभिव्यक्ति है।
NCF 2005 अपने दृष्टिकोण-वक्तव्य में कहती है: 'उत्कृष्ट गणित-शिक्षा की हमारी दृष्टि इस दोहरी मान्यता पर आधारित है कि सभी विद्यार्थी गणित सीख सकते हैं और सभी विद्यार्थियों को गणित सीखने की आवश्यकता है।'
अनौपचारिक और दैनिक गणित
NIOS 504 की एक सबसे महत्त्वपूर्ण अंतर्दृष्टि यह है कि गणित केवल औपचारिक कक्षा में नहीं होता। अनौपचारिक, दैनिक गणित बच्चों के विद्यालय में आने से बहुत पहले से उनके चारों ओर होता है — और उन लोगों के जीवन में भी जारी रहता है जिन्होंने कभी औपचारिक रूप से गणित नहीं पढ़ा।
एक ऐसे दुकानदार पर विचार करें जिसने कभी बीजगणित या औपचारिक अंकगणित की विधियाँ नहीं सीखीं। ऐसा दुकानदार नियमित रूप से: मानसिक रूप से और सटीकता से खुल्ले की गणना करता है; अधिक मुनाफे के लिए वस्तुओं के मूल्यों की तुलना करता है; भार से बिकने वाली वस्तुओं को मिलाते समय समानुपातिक तर्क लगाता है। यह वास्तविक गणितीय चिंतन है — अनौपचारिक, पर सच्चा और मान्य।
NIOS 504 और NCF 2005 दोनों तर्क देती हैं कि कक्षा का गणित इस अनौपचारिक, दैनिक गणित से जुड़ना चाहिए — उसे नकारना नहीं। जब कोई बच्चा एक अनौपचारिक युक्ति विद्यालय लाता है और शिक्षक उसे पाठ्यपुस्तक के एल्गोरिदम के लिए नज़रअंदाज़ या सुधार कर देता है, तो बच्चा सीखता है कि उसकी अपनी सोच ग़लत है — यह आत्मविश्वास को नष्ट करता है और गणित तथा वास्तविक जीवन के बीच की खाई को गहरा करता है।
यह भारत में विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, जहाँ ग्रामीण और श्रमिक-वर्गीय परिवारों के बच्चे पारिवारिक व्यवसाय, खेत और शिल्प में मदद करने से समृद्ध अनौपचारिक गणितीय ज्ञान प्राप्त करते हैं — ज्ञान जिसे पाठ्यपुस्तक-केंद्रित शिक्षण व्यवस्थित रूप से नज़रअंदाज़ करता है। औपचारिक और अनौपचारिक गणित को जोड़ना न केवल शिक्षण-शास्त्र की दृष्टि से उचित है; यह समता का भी प्रश्न है।
प्राथमिक स्तर पर गणितीय भाषा
गणित की अपनी एक भाषा है — प्रतीकों, संकेतों और विशेष पदों की एक प्रणाली जो सटीक संप्रेषण सक्षम करती है। प्राथमिक स्तर पर इस गणितीय भाषा की विशेष आवश्यकताएँ हैं जिन्हें शिक्षकों को समझना चाहिए।
परिशुद्धता। गणितीय भाषा अस्पष्ट नहीं होनी चाहिए। 'त्रिभुज', 'गुणनखंड', 'शेषफल', 'परिमाप' — इनमें से प्रत्येक पद का अपने गणितीय संदर्भ में ठीक एक अर्थ होता है। रोज़मर्रा की भाषा के विपरीत, जहाँ शब्द संदर्भ के साथ अर्थ बदलते हैं, गणितीय पद स्थिर रहते हैं। यह परिशुद्धता एक गुण है — यह तर्क को बिना फिसलन के आगे बढ़ने देती है।
बच्चे की दैनिक भाषा में आधार। NCF 2005 जोर देती है कि औपचारिक गणितीय भाषा उस अनौपचारिक भाषा से जोड़कर प्रस्तुत की जाए जो बच्चे पहले से उपयोग करते हैं। जो बच्चा कहता है 'मैंने इसे बराबर हिस्सों में बाँट दिया' वह पहले से भाग की अभिव्यक्ति कर रहा है; शिक्षक यहाँ से 'समान रूप से बाँटा', फिर 'भाग दिया', फिर ÷ चिह्न तक पहुँचाता है। पुल छोड़ना — सीधे प्रतीकों पर जाना — बच्चों को ऐसे लेबल देता है जिनका वे अर्थ नहीं निकाल सकते।
क्रमिक औपचारिकता। प्राथमिक स्तर पर गणितीय भाषा अत्यंत तकनीकी नहीं होती। जैसे-जैसे अवधारणाएँ पक्की होती हैं, परिष्कृत संकेत धीरे-धीरे प्रस्तुत किए जाते हैं। समझ सुदृढ़ होने से पहले तकनीकी शब्दावली थोपना स्पष्टता के बजाय भ्रम उत्पन्न करती है।
मूर्त–अर्द्ध-मूर्त–अमूर्त (CPA) क्रम
प्राथमिक गणित के लिए शायद सबसे महत्त्वपूर्ण शिक्षण-शास्त्रीय सिद्धांत — जेरोम ब्रूनर के कार्य पर आधारित और NIOS 504 के केंद्र में — है मूर्त–अर्द्ध-मूर्त–अमूर्त (CPA) क्रम, जिसे कभी-कभी क्रियात्मक → प्रतीकात्मक → सांकेतिक भी कहा जाता है।
मूर्त अवस्था (Enactive): बच्चे भौतिक वस्तुओं से काम करते हैं — माचिस की तीलियाँ, कंकड़, राजमा, लकड़ियों के बंडल, गिनतारा, या विशेष Dienes ब्लॉक। अवधारणा इंद्रियानुभव से बनती है: 'दस' का वज़न महसूस करना, वस्तुओं को रंग के अनुसार समूहित करना, मित्रों के बीच बराबर बाँटना। अभी कोई प्रतीक नहीं; समझ सीधे छूने-देखने से आती है।
अर्द्ध-मूर्त अवस्था (Iconic): बच्चे वस्तुओं के साथ जो किया उसे चित्रों, रेखाचित्रों या स्केच में दर्शाते हैं। दस कंकड़ों को एक वृत्त में रखने वाला बच्चा दस बिंदुओं के आसपास वृत्त खींच सकता है। चित्र वास्तविकता का निरूपण है — अभी भी भौतिक संसार से जुड़ा, पर वस्तुओं की उपस्थिति की आवश्यकता नहीं।
अमूर्त अवस्था (Symbolic): बच्चे अब मानक प्रतीकात्मक रूप लिखते हैं — अंक, संक्रिया-चिह्न, समीकरण। प्रतीक अपना अर्थ बच्चे के पहले के मूर्त और अर्द्ध-मूर्त अनुभव से प्राप्त करता है। उन पहले की अवस्थाओं के बिना प्रतीक एक मनमाना चिह्न है; उनके साथ वह समृद्ध अर्थ धारण करता है।
NIOS 504 के अनुसार गणितीय अवधारणा विकास का सही क्रम: (i) वस्तुओं के साथ अनुभव प्रदान करना, (ii) भाषा के माध्यम से विवरण, (iii) चित्रों के माध्यम से निरूपण, (iv) प्रतीकात्मक संकेत का उपयोग। इस क्रम को उलटना या छोड़ना — अनुभव से पहले प्रतीक पढ़ाना — गणित-भय और बिना समझ के प्रक्रियात्मक ज्ञान का मूल कारण है।
प्राथमिक शिक्षकों के लिए कक्षा में निहितार्थ
गणित की प्रकृति को समझने के प्राथमिक शिक्षक की पाठ-योजना और शिक्षण पर सीधे निहितार्थ हैं। NIOS 504 और NCF 2005 से पाँच महत्त्वपूर्ण कक्षा-सूत्र:
पहला, अमूर्तता धीरे-धीरे बनाएँ। हर अवधारणा — संख्या, संक्रिया, आकृति, मापन — को वस्तुओं के माध्यम से, फिर चित्रों से, फिर प्रतीकों से प्रस्तुत करें। नई अवधारणा के लिए कभी प्रतीकों से शुरू न करें, चाहे वयस्क को वह कितनी ही सरल लगे।
दूसरा, अनौपचारिक ज्ञान से जोड़ें। पाठ्यपुस्तक की विधि दिखाने से पहले बच्चों से पूछें कि वे समस्या कैसे हल करते हैं। उनकी अनौपचारिक युक्तियों पर निर्माण करें। उस दुकानदार की चर्चा करें जो मन में खुल्ले की गणना करती है। एकल प्रक्रिया पर जोर देने की बजाय बच्चों की अनेक विधियों को मान्य करें।
तीसरा, गणित को संप्रेषण-योग्य बनाएँ। बच्चों से अपना तर्क ज़ोर से समझाने को कहें। हर उत्तर के बाद 'तुम्हें कैसे पता?' पूछें। बच्चों को दो अलग-अलग विधियों की तुलना करके चर्चा करने दें कि दोनों एक ही उत्तर क्यों देती हैं। इससे सीधे NCF की दृष्टि — गणित को बात करने की वस्तु मानना — बनती है।
चौथा, दोनों उद्देश्यों में संतुलन रखें। गणना-कौशल का अभ्यास करें (संकुचित उद्देश्य), पर खुले प्रश्न भी रखें, अनुमान को प्रोत्साहित करें, बच्चों को अपने प्रश्न बनाने दें (व्यापक उद्देश्य)। जो कक्षा केवल प्रक्रियाओं का अभ्यास कराती है वह गणितीयकरण का विकास नहीं कर रही।
पाँचवाँ, सुरक्षित वातावरण बनाएँ। गणित-भय वहाँ पलता है जहाँ त्रुटियों को दंडित किया जाता है और गति को पुरस्कृत किया जाता है। बच्चों के तर्क का जश्न मनाएँ — यहाँ तक कि ग़लत तर्क का भी जो वास्तविक सोच दर्शाता हो — और त्रुटियों को असफलता की बजाय निदान-सूचना मानें।
CTET परीक्षा फ़ोकस
गणित की प्रकृति से संबंधित प्रश्न लगभग हर CTET चक्र में आते हैं और चार बार-बार आने वाले पैटर्न में केंद्रित हैं।
पैटर्न 1 — पाँच विशेषताएँ। एक कथन दिया जाता है ('गणित सदा अभिसारी है', 'गणित कल्पनाशक्ति को पोषित करता है') और उम्मीदवार को पहचानना होता है कि यह गणित की प्रकृति का सही वर्णन करता है या नहीं। याद रखें: गणित तार्किक, प्रतीकात्मक, परिशुद्ध, संरचनात्मक और अमूर्त है — और इन विशेषताओं के माध्यम से रचनात्मकता और कल्पनाशक्ति को पोषित करता है। 'सदा अभिसारी' ग़लत है — गणित में अपसारी चिंतन भी शामिल है।
पैटर्न 2 — संकुचित बनाम व्यापक उद्देश्य / गणितीयकरण। एक कक्षा-गतिविधि का वर्णन दिया जाता है और पूछा जाता है कि यह संकुचित या व्यापक उद्देश्य की पूर्ति करती है। 48 ÷ 6 की गणना कराना संकुचित उद्देश्य है; बच्चों को विद्यालय कार्यक्रम की समय-सारणी बनाने के लिए गणित का उपयोग करने देना व्यापक उद्देश्य है। डेविड व्हीलर का कथन व्यापक उद्देश्य की पहचान करता है।
पैटर्न 3 — CPA क्रम। प्रश्न चार अनुदेशात्मक चरणों को अव्यवस्थित क्रम में देते हैं और सही विकासात्मक क्रम पूछते हैं। उत्तर सदा है: मूर्त हेरफेर → भाषा/विवरण → चित्र/रेखाचित्र → प्रतीकात्मक संकेत। प्रतीकों से कभी शुरू नहीं करते।
पैटर्न 4 — अनौपचारिक गणित। अशिक्षित दुकानदार या पारंपरिक शिल्पकार के बारे में प्रश्न परखते हैं कि क्या उम्मीदवार जानता है कि अनौपचारिक गणित मान्य है और कक्षा में संसाधन के रूप में उपयोग किया जाना चाहिए। ग़लत उत्तर है 'अनौपचारिक गणित में अस्पष्टता है।' सही उत्तर है 'इसे शिक्षकों द्वारा वैकल्पिक युक्ति के रूप में चर्चा में लाना चाहिए।'
अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन गणित की प्रकृति के बारे में सबसे अधिक उपयुक्त है/हैं? A. यह बच्चे को सृजनात्मक बनने में सहायता करता है। B. यह बच्चे की कल्पना को पोषित करने में सहायता करता है। C. यह निगमनात्मक विवेचन (तर्क) पर आधारित है। D. यह हमेशा अभिसारी होता है। सही विकल्प चुनिए :
व्याख्या: गणित रचनात्मकता और कल्पनाशक्ति को पोषित करता है — ये दोनों कथन इसकी प्रकृति का सही वर्णन करते हैं। हालाँकि 'गणित सदा अभिसारी है' गलत है: गणित में अपसारी चिंतन भी शामिल है (खुली समस्याएँ, अनेक हल-विधियाँ, अनेक प्रमाण)। 'केवल निगमनात्मक तर्क पर आधारित' भी अशुद्ध है — आगमनात्मक तर्क उतना ही केंद्रीय है। इसलिए A और B सबसे उचित कथन-युगल हैं।
स्रोत: CTET अगस्त 2023 पेपर 1, प्र.31
Q2. अशिक्षित दुकानदार द्वारा उपयोग किया जाने वाला गणित—
व्याख्या: अशिक्षित दुकानदार का गणित वास्तविक गणितीय चिंतन है — सटीक मानसिक गणनाएँ, समानुपातिक तर्क, मूल्य-तुलना। NCF 2005 तर्क देती है कि अनौपचारिक गणित को एक वैध कक्षा-संसाधन माना जाए, वैकल्पिक युक्ति के रूप में चर्चा में लाया जाए। इसे 'अस्पष्ट या कम शुद्धता वाला' कहना एक पाठ्यपुस्तक-केंद्रित दृष्टिकोण है जो वास्तविक जीवन के गणितीय ज्ञान को नकारता है।
स्रोत: CTET दिसंबर 2018 पेपर 1, प्र.37
Q3. बच्चों में गणित के प्रति अभिरुचि को विकसित करने के लिए, एक अध्यापिका निम्नलिखित गतिविधियाँ अपनी कक्षा में करती हैं। इनमें से वह चुनिए जो उसके उद्देश्य को पूरा करने में प्रभावी नहीं है।
व्याख्या: गणित के प्रति अभिरुचि विकसित करना अर्थात् विषय के प्रति आंतरिक प्रेम जगाना — इतिहास, पहेलियों, खोज और सहयोगी खोज के माध्यम से। केवल सर्वाधिक अंक पाने वाले छात्र की प्रशंसा करना प्रभावी नहीं है क्योंकि यह गणित के आनंद की बजाय अंक-प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देता है। भारतीय गणितज्ञों पर वीडियो, जादुई वर्ग और गणित-कोना सभी वास्तविक अभिरुचि का निर्माण करते हैं।
स्रोत: CTET अगस्त 2023 पेपर 1, प्र.32
Q4. प्राथमिक स्तर पर गणितीय भाषा की निम्नलिखित में से कौन-सी विशेषताएँ होनी चाहिए? (a) यह अस्पष्ट होनी चाहिए क्योंकि यह विषय में खुलापन जोड़ सकती है। (b) यह स्पष्ट होनी चाहिए। (c) बच्चों की दैनिक जीवन में उपयोग की जाने वाली भाषा के माध्यम से इसे प्रबलित किया जाना चाहिए। (d) यह अत्यधिक तकनीकी होनी चाहिए क्योंकि यह विद्यार्थियों को गणित में सटीकता से संवाद करने में सहायता करेगी। सही विकल्प चुनें :
व्याख्या: प्राथमिक स्तर पर गणितीय भाषा परिशुद्ध होनी चाहिए — अस्पष्टता से मुक्त — और बच्चे की दैनिक भाषा में आधारित होनी चाहिए, जो अनौपचारिक और औपचारिक अभिव्यक्ति के बीच सेतु बनाती है। अस्पष्टता का गणितीय भाषा में कोई स्थान नहीं है; गणितीय परिशुद्धता उसकी पाँच विशेषताओं में से एक है। प्राथमिक स्तर पर अत्यंत तकनीकी शब्दावली अनावश्यक बाधाएँ उत्पन्न करती है।
स्रोत: CTET जनवरी 2024 पेपर 1, प्र.31
Q5. प्राथमिक कक्षाओं में एक गणितीय अवधारणा के विकास में निम्नलिखित अनुदेशों में से किस अनुक्रम का पालन किया जाना चाहिए? I. चित्र बनाना II. प्रतीकात्मक निरूपण का उपयोग करना III. अनुभव प्रदान करना IV. भाषा के माध्यम से समझाना
व्याख्या: NIOS 504 और NCF 2005 का CPA (मूर्त–अर्द्ध-मूर्त–अमूर्त) क्रम बताता है कि अवधारणा विकास वस्तुओं के अनुभव से शुरू होना चाहिए, फिर भाषा और चित्र, और अंत में प्रतीकात्मक संकेत। दिए गए चार चरणों का सही क्रम है: (III) अनुभव प्रदान करना → (I) चित्र बनाना → (IV) भाषा से समझाना → (II) प्रतीकात्मक निरूपण। अनुभव से पहले प्रतीक पढ़ाना समझ के बिना प्रक्रियात्मक ज्ञान और गणित-भय का कारण बनता है।
स्रोत: CTET दिसंबर 2018 पेपर 1, प्र.32