कोशिका — जीवन की मूलभूत इकाई
कोशिका समस्त जीवधारियों की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई है। सन् 1665 में रॉबर्ट हुक ने कॉर्क की पतली परत का सूक्ष्मदर्शी से अवलोकन करते हुए पहली बार कोशिकाएँ देखीं। उन्होंने इन्हें कोशिका (Cell) नाम दिया, जो लैटिन शब्द cellula (छोटा कमरा) से लिया गया है।
कोशिकाएँ मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं। प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ (जीवाणु और नील-हरित शैवाल में) में झिल्ली से घिरा केन्द्रक नहीं होता; आनुवंशिक पदार्थ सीधे कोशिकाद्रव्य में रहता है। यूकैरियोटिक कोशिकाएँ (पादप, जन्तु, कवक, प्रोटिस्ट में) में सुपरिभाषित केन्द्रक होता है जो केन्द्रक झिल्ली से घिरा रहता है।
जन्तु कोशिका के प्रमुख कोशिकांग हैं: केन्द्रक (कोशिका की समस्त गतिविधियाँ नियंत्रित करता है; DNA रखता है), माइटोकॉन्ड्रिया (एरोबिक श्वसन का स्थल; 'कोशिका का पावरहाउस'), राइबोसोम (प्रोटीन संश्लेषण का स्थल), अन्तर्प्रद्रव्यी जालिका (परिवहन तंत्र) तथा गॉल्गी उपकरण (पदार्थों की पैकेजिंग और स्राव)।
पादप कोशिकाओं में तीन अतिरिक्त संरचनाएँ होती हैं जो जन्तु कोशिका में नहीं पाई जातीं: कोशिका भित्ति (सेल्युलोज से बनी; कठोर; आकृति और सुरक्षा प्रदान करती है), रिक्तिका (बड़ी केन्द्रीय रिक्तिका; स्फीति दाब बनाए रखती है), तथा हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) (हरे वर्णक क्लोरोफिल से युक्त; प्रकाश-संश्लेषण का स्थल)।
- कोशिका झिल्ली: अर्धपारगम्य; पदार्थों के प्रवेश और निकास को नियंत्रित करती है।
- कोशिकाद्रव्य: जेली जैसा तरल पदार्थ जो कोशिका को भरता है और कोशिकांगों को निलम्बित रखता है।
- केन्द्रक: गुणसूत्र (DNA) से युक्त; सभी उपापचयी क्रियाओं का निर्देशक।
CTET पेपर 2 में पादप और जन्तु कोशिकाओं में अन्तर, चित्रों से कोशिकांगों की पहचान, तथा कोशिका को जीवन की मूलभूत इकाई कहे जाने के कारण पर प्रश्न पूछे जाते हैं।
पौधों और जन्तुओं में पोषण
पोषण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा जीव भोजन प्राप्त करते और उपयोग करते हैं। जीवों को भोजन प्राप्ति के आधार पर दो वर्गों में बाँटा जाता है।
स्वपोषी (Autotrophs) सरल अकार्बनिक पदार्थों से अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। हरे पौधे मुख्य स्वपोषी हैं; वे प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया से क्लोरोफिल की सहायता से सूर्य-प्रकाश, कार्बन डाइऑक्साइड और जल द्वारा ग्लूकोज और ऑक्सीजन बनाते हैं। समीकरण है: 6CO₂ + 6H₂O → C₆H₁₂O₆ + 6O₂। पत्तियों में रन्ध्र (stomata) गैस विनिमय में सहायता करते हैं; जड़ें मिट्टी से जल और खनिज अवशोषित करती हैं।
कुछ पौधे जैसे अमरबेल (Cuscuta) परजीवी हैं — ये पोषक पादप से पोषण लेते हैं। घटपर्णी (Pitcher plant) और शुक्रमाँसभक्षी (Venus flytrap) कीटभक्षी पादप हैं जो कीड़ों को पचाकर नाइट्रोजन प्राप्त करते हैं। कवक और कुछ जीवाणु मृतजीवी (Saprophytes) हैं।
विषमपोषी (Heterotrophs) अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते। जन्तुओं को आहार के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है:
- शाकाहारी (जैसे गाय, खरगोश): केवल पौधे खाते हैं।
- मांसाहारी (जैसे शेर, बाज): केवल अन्य जन्तु खाते हैं।
- सर्वाहारी (जैसे मनुष्य, कौआ): पौधे और जन्तु दोनों खाते हैं।
मानव पाचन तंत्र में पाचन मुँह से आरम्भ होता है जहाँ लार में उपस्थित एमाइलेज स्टार्च को तोड़ता है। भोजन ग्रसिका से होता हुआ आमाशय में पहुँचता है जहाँ जठर रस (HCl + पेप्सिन) प्रोटीन पाचन करता है। छोटी आँत में पित्त वसा का पायसीकरण करता है और अग्न्याशयी रस पाचन पूर्ण करता है। विली (रसांकुर) के कारण अवशोषण सतह बढ़ जाती है जिससे पोषक तत्त्व रक्त में अवशोषित होते हैं। अपाच्य पदार्थ बड़ी आँत और मलाशय से बाहर निकलता है।
जीवों में श्वसन
श्वसन वह जैवरासायनिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोशिकाएँ भोजन (मुख्यतः ग्लूकोज) को तोड़कर ATP के रूप में ऊर्जा मुक्त करती हैं। श्वसन और श्वास-क्रिया में अन्तर समझना आवश्यक है: श्वास-क्रिया फेफड़ों में वायु के आवागमन की यांत्रिक प्रक्रिया है, जबकि श्वसन कोशिका स्तर पर होता है।
वायु श्वसन (एरोबिक श्वसन) ऑक्सीजन की उपस्थिति में माइटोकॉन्ड्रिया में होता है: C₆H₁₂O₆ + 6O₂ → 6CO₂ + 6H₂O + ऊर्जा (ATP)। यह ऊष्माक्षेपी (exothermic) अभिक्रिया है जो प्रति ग्लूकोज अणु लगभग 38 ATP अणु उत्पन्न करती है।
अवायु श्वसन (अनैरोबिक श्वसन) ऑक्सीजन के बिना होता है। यीस्ट और कुछ जीवाणुओं में ग्लूकोज एथेनॉल और CO₂ में बदलता है (किण्वन)। तीव्र व्यायाम के दौरान मांसपेशियों में ग्लूकोज लैक्टिक अम्ल में बदलता है जिससे थकान और ऐंठन होती है। अवायु श्वसन केवल 2 ATP अणु बनाता है — बहुत कम दक्ष।
विभिन्न जीवों में विभिन्न श्वसन अंग पाए जाते हैं:
- मछलियाँ: क्लोम (गिल्स) द्वारा जल में घुले ऑक्सीजन को ग्रहण करती हैं। जल में वायु की अपेक्षा बहुत कम ऑक्सीजन होती है, इसलिए मछलियों की श्वसन दर तेज़ होती है, न कि धीमी।
- कीट: श्वास-नलिका (ट्रैकिया) तंत्र द्वारा वायु सीधे कोशिकाओं तक पहुँचती है।
- केंचुआ: नम त्वचा से विसरण द्वारा श्वसन करता है।
- उभयचर (मेंढक): फेफड़े और नम त्वचा दोनों से श्वसन।
- स्तनधारी और पक्षी: फेफड़ों में वायुकोष (एल्वियोली) द्वारा गैस विनिमय।
मानव में वायु नाक से प्रवेश कर श्वासनली (ट्रेकिया), श्वसनी (ब्रॉन्काई) से होती हुई वायुकोषों (एल्वियोली) तक पहुँचती है जहाँ ऑक्सीजन रक्त में जाती है और CO₂ बाहर आती है। डायफ्राम और पसली-पेशियाँ श्वास-प्रश्वास को नियंत्रित करती हैं।
CTET में प्रकाश-संश्लेषण और श्वसन की प्रकृति (क्रमशः ऊष्माशोषी और ऊष्माक्षेपी) तथा जलीय जीवों की श्वसन दर पर प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
पौधों और जन्तुओं में परिवहन
प्रत्येक कोशिका तक पोषक तत्त्व, गैसें और अपशिष्ट पदार्थ पहुँचाने और वापस लाने के लिए जीवों में कुशल परिवहन तंत्र होना आवश्यक है। पौधों में संवहन तंत्र और जन्तुओं में परिसंचरण तंत्र यह कार्य करता है।
पौधों में परिवहन दो प्रकार के संवहन ऊतकों द्वारा होता है:
- जाइलम: जड़ों से पत्तियों तक जल और खनिज लवण एकदिशीय (ऊपर की ओर) ले जाता है। वाष्पोत्सर्जन खिंचाव (Transpiration pull) जल को ऊपर खींचता है। जाइलम वाहिकाएँ मृत कोशिकाओं से बनी होती हैं।
- फ्लोएम: पत्तियों में बने भोजन (सुक्रोज, अमीनो अम्ल) को पौधे के सभी भागों तक दोनों दिशाओं में ले जाता है — इसे स्थानान्तरण (Translocation) कहते हैं। फ्लोएम कोशिकाएँ जीवित होती हैं।
वाष्पोत्सर्जन पत्तियों के रन्ध्रों से जलवाष्प के निकलने की प्रक्रिया है। यह जल एवं खनिजों के अवशोषण में, पत्ती की सतह को ठंडा रखने में और स्फीति बनाए रखने में सहायक है।
जन्तुओं में परिवहन — परिसंचरण तंत्र: मानव परिसंचरण तंत्र में हृदय, रक्त वाहिकाएँ (धमनियाँ, शिराएँ और केशिकाएँ) तथा रक्त शामिल हैं।
- धमनियाँ (Arteries): हृदय से ऑक्सीजनयुक्त रक्त ले जाती हैं (फुफ्फुसीय धमनी अपवाद)। दीवारें मोटी और लचीली होती हैं।
- शिराएँ (Veins): हृदय की ओर विऑक्सीकृत रक्त ले जाती हैं (फुफ्फुसीय शिरा अपवाद)। वाल्व पश्चप्रवाह रोकते हैं।
- केशिकाएँ (Capillaries): सूक्ष्म वाहिकाएँ जहाँ रक्त और कोशिकाओं के बीच गैसों, पोषक तत्त्वों और अपशिष्ट का वास्तविक आदान-प्रदान होता है।
मानव हृदय में चार कक्ष हैं: दायाँ अलिन्द, दायाँ निलय, बायाँ अलिन्द, बायाँ निलय। यह संवृत, द्विसंचरी परिसंचरण तंत्र है: फुफ्फुसीय संचरण (हृदय → फेफड़े → हृदय) और दैहिक संचरण (हृदय → शरीर → हृदय)। चार-कक्षीय हृदय में ऑक्सीजनयुक्त और विऑक्सीकृत रक्त कभी नहीं मिलते।
रक्त के चार घटक हैं: प्लाज्मा (तरल भाग), लाल रक्त कणिकाएँ/RBC (हीमोग्लोबिन द्वारा ऑक्सीजन परिवहन), श्वेत रक्त कणिकाएँ/WBC (प्रतिरक्षा), और प्लेटलेट्स (रक्त का थक्का जमाना)।
प्रजनन
प्रजनन वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा जीव अपनी ही प्रजाति की सन्तान उत्पन्न करते हैं। प्रजनन मुख्यतः दो प्रकार का होता है: अलैंगिक और लैंगिक।
अलैंगिक प्रजनन में केवल एक जनक होता है और सन्तानें आनुवंशिक रूप से जनक के समान (क्लोन) होती हैं। विधियाँ:
- द्विखण्डन: जनक दो भागों में विभाजित हो जाता है (अमीबा, जीवाणु)।
- मुकुलन: जनक पर एक छोटी-सी उभार (मुकुल) विकसित होकर अलग हो जाती है (हाइड्रा, यीस्ट)।
- बीजाणु निर्माण: ब्रेड मोल्ड (राइजोपस) बीजाणु (spores) बनाता है जो अनुकूल परिस्थितियों में अंकुरित होते हैं।
- कायिक प्रवर्धन: पौधे के वानस्पतिक भागों से नए पौधे — तना (आलू के कन्द, अदरक का प्रकन्द, स्ट्राबेरी के भूस्तारी), जड़ें (शकरकन्द), पत्तियाँ (ब्रायोफिलम)।
- खण्डन: शरीर टुकड़ों में टूट जाता है और प्रत्येक टुकड़ा नया जीव बनाता है (स्पाइरोगायरा)।
लैंगिक प्रजनन में नर और मादा युग्मकों के संयुग्मन (निषेचन) से युग्मनज (zygote) बनता है। इससे आनुवंशिक विभिन्नता आती है।
पुष्पी पौधों में लैंगिक प्रजनन में परागण — परागकण का परागकोश से वर्तिकाग्र तक स्थानान्तरण — आवश्यक है। स्वपरागण केवल द्विलिंगी पुष्पों में सम्भव है। परपरागण में परागकण वायु, जल, कीट या जन्तुओं द्वारा अलग पौधे के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं। द्विलिंगी पुष्प दोनों प्रकार के परागण कर सकते हैं।
निषेचन के बाद बीजाण्ड बीज बनता है और अण्डाशय फल बनता है। बीज-प्रकीर्णन वायु (मेपल), जल (नारियल), जन्तुओं (काँटेदार बीज), या स्व-प्रकीर्णन (छुई-मुई) द्वारा होता है।
मानव प्रजनन में जब दो अलग-अलग शुक्राणु दो अलग-अलग अण्डाणुओं से मिलते हैं तो दो भिन्न युग्मनज बनते हैं — ये भ्रातृज (द्विअण्डज) जुड़वाँ होते हैं जिनकी आनुवंशिक संरचना भिन्न होती है और लिंग भी अलग हो सकता है। एक निषेचित अण्ड के दो भागों में विभाजन से समरूप (एकअण्डज) जुड़वाँ बनते हैं जो आनुवंशिक रूप से एकसमान होते हैं।
जीवधारियों का वर्गीकरण
वर्गीकरण जीवों को साझा लक्षणों के आधार पर क्रमबद्ध समूहों में व्यवस्थित करने की प्रणाली है। यह जीवन की विशाल विविधता का अध्ययन सरल बनाता है और विकासवादी सम्बन्धों को दर्शाता है।
लिनियस की दो-जगत (पादप और जन्तु) वर्गीकरण प्रणाली को बाद में R.H. व्हिटेकर (1969) की पाँच-जगत वर्गीकरण प्रणाली ने प्रतिस्थापित किया: मोनेरा, प्रोटिस्टा, कवक (Fungi), पादप (Plantae) और जन्तु (Animalia)।
वर्गीकरण का मानक क्रम (व्यापक से विशिष्ट): जगत → संघ (या विभाग) → वर्ग → गण → कुल → वंश → जाति। जीव के वैज्ञानिक नाम में वंश और जाति का नाम होता है (द्विनाम नामपद्धति)।
पादप जगत का वर्गीकरण:
- थैलोफाइटा: सरलतम पौधे; जड़, तना, पत्ती नहीं; शैवाल (स्पाइरोगायरा, यूलोथ्रिक्स) और कवक।
- ब्रायोफाइटा: पादप जगत के उभयचर; संवहन ऊतक नहीं; जैसे काई (मॉस) और लिवरवर्ट।
- टेरिडोफाइटा: पहले संवहनी स्थलीय पौधे; बीजाणुओं से प्रजनन; जैसे फर्न।
- अनावृतबीजी (जिम्नोस्पर्म): नग्न बीज (फल से अनावृत); जैसे चीड़, साइकस।
- आवृतबीजी (एंजियोस्पर्म): पुष्पी पौधे; बीज फल के अन्दर। एकबीजपत्री (गेहूँ, मक्का) और द्विबीजपत्री (मटर, आम)।
जन्तु जगत का वर्गीकरण:
- पोरिफेरा: छिद्रयुक्त जन्तु; स्पंज।
- सीलेन्टेरेटा: खोखले शरीरवाले; हाइड्रा, जेलीफिश।
- प्लैटीहेल्मिन्थीज: चपटे कृमि; फीताकृमि, प्लानेरिया।
- नेमैटोडा: गोल कृमि; एस्केरिस।
- एनेलिडा: खण्डयुक्त कृमि; केंचुआ, जोंक।
- आर्थ्रोपोडा: सबसे बड़ा संघ; सन्धिपाद; कीट, मकड़ी, केकड़ा।
- मोलस्का: कोमल शरीर; घोंघा, ऑक्टोपस।
- एकाइनोडर्मेटा: कण्टकचर्मी समुद्री जन्तु; तारामछली।
- कॉर्डेटा: नॉटोकॉर्ड वाले; मछली, उभयचर, सरीसृप, पक्षी, स्तनधारी।
सूक्ष्मजीव: मित्र और शत्रु
सूक्ष्मजीव वे जीव हैं जो इतने छोटे होते हैं कि नग्न आँखों से नहीं देखे जा सकते; इन्हें केवल सूक्ष्मदर्शी से देखा जा सकता है। प्रमुख समूह हैं: जीवाणु (Bacteria), विषाणु (Virus), कवक (Fungi), शैवाल (Algae) और प्रोटोजोआ।
सूक्ष्मजीवों के लाभकारी कार्य:
- नाइट्रोजन स्थिरीकरण: राइजोबियम (दलहनी पौधों की जड़ ग्रन्थिकाओं में) और एजोटोबैक्टर वायुमण्डलीय नाइट्रोजन को अमोनिया में बदलकर मिट्टी उपजाऊ बनाते हैं।
- अपघटन: जीवाणु और कवक मृत जीवों को तोड़कर पोषक तत्त्वों को मिट्टी में वापस लौटाते हैं।
- खाद्य उद्योग: लैक्टोबेसिलस दूध को दही में बदलता है। यीस्ट (सैकरोमाइसीज) शर्करा को किण्वित करके एल्कोहॉल और CO₂ बनाता है — रोटी बनाने और शराब उद्योग में उपयोगी।
- औषधि: पेनिसिलिन (पहला प्रतिजैविक) अलेक्जेण्डर फ्लेमिंग ने कवक पेनिसिलियम नोटेटम से खोजा। अनेक टीके कमज़ोर या मृत सूक्ष्मजीवों से बनाए जाते हैं।
- बायोगैस उत्पादन: मेथेनोजन जीवाणु कार्बनिक अपशिष्ट को विघटित कर मेथेन गैस बनाते हैं।
सूक्ष्मजीवों के हानिकारक प्रभाव:
- मानव रोग: टायफाइड और हैजा (जीवाणु), सामान्य जुकाम और इन्फ्लुएन्जा (विषाणु), मलेरिया (प्रोटोजोआ प्लाज्मोडियम; मादा एनोफेलीज मच्छर द्वारा), दाद (कवक)।
- खाद्य पदार्थों का खराब होना: जीवाणु और कवक से भोजन सड़ता है। परिरक्षक, प्रशीतन, पाश्चुरीकरण और नमक से रोका जाता है।
- पादप रोग: गेहूँ की रस्ट, नींबू का कैंकर।
- प्रतिजैविक प्रतिरोध: अत्यधिक उपयोग से प्रतिरोधी जीवाणु जन्म लेते हैं।
स्वच्छता, सुरक्षित पेयजल, टीकाकरण और व्यक्तिगत स्वच्छता — ये महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य उपाय हैं जो CTET विज्ञान और शिक्षाशास्त्र दोनों प्रश्नों में प्रासंगिक हैं।
जीवों में अनुकूलन
अनुकूलन किसी जीव की वे संरचनात्मक, शारीरिक या व्यावहारिक विशेषताएँ हैं जो उसे अपने आवास में जीवित रहने और प्रजनन करने में सहायता करती हैं। अनुकूलन प्राकृतिक वरण (Natural Selection) की प्रक्रिया द्वारा अनेक पीढ़ियों में विकसित होते हैं।
जलीय अनुकूलन: मछलियों का शरीर चिकना और धारारेखीय (streamlined) होता है जिससे जल प्रतिरोध कम होता है। गिल्स (क्लोम) द्वारा घुला ऑक्सीजन लेती हैं। व्हेल और डॉल्फिन (स्तनधारी) के पंख-जैसे अग्रपाद (फ्लिपर) हैं और सिर के ऊपर वायु-छिद्र (blowhole) से साँस लेते हैं। जलीय पौधों जैसे कमल में लम्बे लचीले तने और वायुकाश (aerenchyma) होते हैं।
मरुस्थलीय अनुकूलन: कैक्टस के मोटे माँसल तने में जल संग्रहीत रहता है; पत्तियाँ काँटों में रूपान्तरित हो जाती हैं जिससे जलवाष्पन कम होता है। ऊँट की पीठ पर कूबड़ में वसा संग्रहीत रहती है; सान्द्र मूत्र बनाकर जल का संरक्षण करता है। लम्बी पलकें रेत से आँखों को बचाती हैं।
ध्रुवीय अनुकूलन: ध्रुवीय भालू की मोटी रोम और चर्बी (blubber) की परत ऊष्मारोधन करती है। पेंग्विन ऊष्मा बचाने के लिए एकत्र होकर रहते हैं। आर्कटिक के अनेक पौधे छोटे और ज़मीन से सटे रहते हैं ताकि ठंडी हवाओं से बचें।
वनीय अनुकूलन: घने जंगलों में वृक्ष सूर्य-प्रकाश के लिए ऊँचे उगते हैं; कई में आधार पर स्तम्भ मूल (buttress roots) होती हैं। परजीवी और अधिपादप (epiphytes) जैसे ऑर्किड कम प्रकाश में जीते हैं।
मौसमी अनुकूलन: अनेक पक्षी सर्दियों में प्रवास (migration) करते हैं — जैसे साइबेरियाई सारस भारत आते हैं। कुछ स्तनधारी शीतनिद्रा (hibernation) में चले जाते हैं और उपापचय दर घटा लेते हैं। शीतोष्ण क्षेत्रों में पर्णपाती वृक्ष पत्तियाँ गिराकर जल-हानि कम करते हैं।
व्यावहारिक अनुकूलन: रात्रिचर (nocturnal) व्यवहार, छद्मावरण (camouflage) जैसे गिरगिट और छड़ी कीट, और अनुकरण (mimicry) — अनुकूलन के महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं। ये अवधारणाएँ CTET में पर्यावरण शिक्षा से जुड़ी गतिविधियों के लिए भी प्रासंगिक हैं।
अभ्यास प्रश्न
Q1. अभिकथन (A): जलीय जीवों में श्वसन दर स्थलीय जीवों की अपेक्षा धीमी होती है। तर्क (R): जल में बड़ी मात्रा में घुले हुए ऑक्सीजन की उपस्थिति जलीय जीवों की श्वसन दर को प्रभावित करती है।
व्याख्या: दोनों कथन गलत हैं। जलीय जीव वास्तव में स्थलीय जीवों की तुलना में तेज़ श्वसन करते हैं क्योंकि जल में वायु की अपेक्षा बहुत कम घुला ऑक्सीजन होता है — इसलिए उन्हें उतनी ही ऑक्सीजन पाने के लिए अधिक जल प्रवाहित करना पड़ता है। तर्क भी गलत है — ऑक्सीजन की अधिकता नहीं बल्कि कमी श्वसन दर को प्रभावित करती है।
स्रोत: CTET Jul 2024 P2, Q64
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा मानव परिसंचरण प्रणाली को वर्णित करेगा?
व्याख्या: मानव परिसंचरण तंत्र संवृत है — रक्त सदैव वाहिकाओं में रहता है और शरीर की गुहाओं में नहीं जाता। यह द्विसंचरी भी है — रक्त एक पूर्ण चक्र में दो बार हृदय से होकर गुज़रता है: फुफ्फुसीय संचरण (हृदय → फेफड़े → हृदय) और दैहिक संचरण (हृदय → शरीर → हृदय)। चार-कक्षीय हृदय ऑक्सीजनयुक्त और विऑक्सीकृत रक्त को अलग रखता है।
स्रोत: CTET Jul 2024 P2, Q69
Q3. निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं? (a) स्वपरागण केवल द्विलिंगी पुष्पों (फूलों) में होता है। (b) द्विलिंगी पुष्प (फूल), स्व एवं पर-परागण दोनों प्रकार से परागण हो सकते हैं।
व्याख्या: दोनों कथन सही हैं। स्वपरागण के लिए परागकोश और वर्तिकाग्र दोनों एक ही पुष्प में होने चाहिए — यह केवल द्विलिंगी पुष्पों में सम्भव है, इसलिए कथन (a) सही है। द्विलिंगी पुष्प में परागण वायु, जल या कीट द्वारा दूसरे पौधे से भी हो सकता है — इसलिए कथन (b) भी सही है।
स्रोत: CTET Jul 2024 P2, Q74
Q4. पुरुष के दो शुक्राणु स्त्री के दो अंड (डिंब) से मिलते हैं। बनने वाले जुड़वाँ बच्चे होंगे:
व्याख्या: जब दो अलग-अलग शुक्राणु दो अलग-अलग अण्डाणुओं को निषेचित करते हैं तो दो स्वतंत्र युग्मनज बनते हैं जिनकी आनुवंशिक संरचना भिन्न होती है। ऐसे जुड़वाँ भ्रातृज (द्विअण्डज) कहलाते हैं। समरूप जुड़वाँ एक निषेचित अण्ड के विभाजन से बनते हैं — यह स्थिति यहाँ नहीं है।
स्रोत: CTET Jul 2024 P2, Q76
Q5. नीचे दिए कथनों को पढ़िए और सही उत्तर का चुनाव कीजिए: S1 - प्रकाश संश्लेषण ऊष्माशोषी अभिक्रिया है। S2 - श्वसन ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया है।
व्याख्या: प्रकाश संश्लेषण ऊष्माशोषी है — यह सूर्य से प्रकाश ऊर्जा अवशोषित करके उसे ग्लूकोज में रासायनिक ऊर्जा के रूप में संग्रहीत करता है। श्वसन ऊष्माक्षेपी है — यह ग्लूकोज को तोड़कर ATP और ऊष्मा के रूप में ऊर्जा मुक्त करता है। अतः दोनों कथन S1 और S2 सही हैं।
स्रोत: CTET Jul 2024 P2, Q81