वायुमंडल की संरचना एवं परतें
वायुमंडल गुरुत्व द्वारा पृथ्वी से बंधी गैसों का आवरण है। यह सतह से लगभग 10,000 किमी तक फैला है, यद्यपि इसके द्रव्यमान का 99% से अधिक भू-तल से 50 किमी के भीतर ही है। समुद्र-तल पर शुष्क वायु में आयतन के अनुसार लगभग 78% नाइट्रोजन, 21% ऑक्सीजन तथा 1% अन्य गैसें होती हैं — आर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड, निऑन, हीलियम, मीथेन एवं ओज़ोन — और साथ में परिवर्तनशील मात्रा में जल-वाष्प एवं धूल-कण।
नाइट्रोजन नाइट्रोजन-चक्र के माध्यम से पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक है। ऑक्सीजन श्वसन एवं दहन को बनाए रखती है। कार्बन डाइऑक्साइड यद्यपि 0.04% से भी कम है, फिर भी अति महत्त्वपूर्ण है — यह ऊष्मा को रोकती है (हरितगृह प्रभाव) तथा प्रकाश-संश्लेषण का कच्चा माल है। जल-वाष्प सभी बादलों, वर्षा, ओस एवं हिम का स्रोत है। धूल-कण उन नाभिकों का कार्य करते हैं जिन पर जल-बूँदें संघनित होती हैं।
ताप परिवर्तन के आधार पर वायुमंडल को पाँच परतों में बाँटा जाता है। क्षोभमंडल सतह से लगभग 8–18 किमी तक है; इसमें 75% वायु-द्रव्यमान तथा लगभग सारी जल-वाष्प है — यहीं मौसम होता है तथा ऊँचाई के साथ ताप गिरता है (लगभग 6.5°C प्रति किमी)। समतापमंडल 50 किमी तक है; इसमें ओज़ोन परत है जो हानिकारक पराबैंगनी विकिरण को अवशोषित करती है। यहाँ वायुयान उड़ते हैं क्योंकि वायु शुष्क एवं स्थिर है। मध्यमंडल 80 किमी तक है; अंतरिक्ष से आने वाले उल्का-पिंड यहीं जल जाते हैं — 'टूटे तारे'। तापमंडल लगभग 400 किमी तक है तथा इसमें आयनमंडल है जो रेडियो तरंगों को परावर्तित कर दूरस्थ संचार संभव करता है; ध्रुवीय प्रभा (अरोरा) यहीं दिखती है। इसके आगे बाह्यमंडल है — सबसे विरल बाहरी परत जो अंतरिक्ष में मिल जाती है।
CTET-प्रिय दो तथ्य — (1) क्षोभमंडल सबसे निचली परत है तथा सभी मौसमी क्रियाओं का स्थल है, (2) उल्का-पिंड मध्यमंडल में जलते हैं। वायुमंडल जीवन की रक्षा उल्काओं को जलाकर, ओज़ोन परत में पराबैंगनी विकिरण को छानकर, हरितगृह प्रभाव से ऊष्मा थामकर तथा ऑक्सीजन देकर करता है।
मौसम एवं जलवायु
मौसम किसी स्थान पर वायुमंडल की दैनिक दशा है — इसमें तापमान, आर्द्रता, वर्षा, पवन, बादल एवं वायुदाब सम्मिलित हैं। मौसम कुछ ही घंटों में बदल सकता है। दूसरी ओर जलवायु किसी स्थान की दीर्घकालिक — सामान्यतः कम-से-कम 30 वर्षों — की औसत मौसमी दशाएँ हैं। एक धूप-भरा दोपहर 'मौसम' है; जोधपुर का वर्ष भर गरम एवं शुष्क रहना 'जलवायु' है।
मौसम एवं जलवायु के मुख्य तत्व समान हैं — तापमान, आर्द्रता, वर्षा, दाब एवं पवन। आतपन (insolation) अर्थात् सूर्य से प्राप्त ऊर्जा मूल चालक है। आतपन भूमध्य रेखा के निकट सर्वाधिक होता है (जहाँ किरणें लंबवत् पड़ती हैं) तथा ध्रुवों पर न्यूनतम (जहाँ किरणें तिरछी पड़कर अधिक क्षेत्र पर फैल जाती हैं)। यही असमान तापन वायुदाब में अंतर पैदा करता है जो वैश्विक पवनों को चलाता है।
किसी स्थान की जलवायु को नियंत्रित करने वाले कारक हैं — अक्षांश (भूमध्य रेखा से दूरी), ऊँचाई (समुद्र-तल से, तापमान लगभग 6.5°C प्रति किमी की दर से गिरता है), समुद्र से दूरी (तटीय स्थानों की जलवायु समशीतोष्ण; अंतःस्थलीय स्थानों की महाद्वीपीय चरम), समुद्री धाराएँ तथा पवनें। भारत की जलवायु उष्णकटिबंधीय मानसून है, जिसमें चार ऋतुएँ हैं — शीत (दिसंबर–फरवरी), ग्रीष्म (मार्च–मई), दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून–सितंबर) तथा लौटता मानसून (अक्टूबर–नवंबर)।
शिक्षण-दृष्टि से मौसम और जलवायु का अंतर अति महत्त्वपूर्ण विषय है। बालक दोनों में भ्रम करते हैं क्योंकि शब्द एक से लगते हैं। उत्तम कक्षा-तकनीक है — एक माह तक 'मौसम-डायरी' (दैनिक तापमान, वर्षा, बादल) रखना, फिर राज्य जलवायु-एटलस से उसी माह का 30-वर्षीय औसत निकालकर तुलना करना — विद्यार्थी स्वयं देखते हैं कि एक स्नैपशॉट है, दूसरी औसत। CTET आतपन, मानसून-पवनें (ग्रीष्म में दक्षिण-पश्चिम, शीत में उत्तर-पूर्व) एवं मौसम-जलवायु के अंतर पर बार-बार प्रश्न पूछता है।
पवन प्रणाली एवं दाब पेटियाँ
वायु का भार होता है, और इकाई क्षेत्र पर ऊपर से वायु-स्तंभ का भार वायुमंडलीय दाब कहलाता है। दाब बैरोमीटर से मिलीबार (mb) में मापा जाता है। समुद्र-तल पर औसत दाब लगभग 1013 mb है। वायु उच्च दाब क्षेत्र से निम्न दाब क्षेत्र की ओर चलती है — यही क्षैतिज गति पवन है। दाब का अंतर जितना अधिक, पवन उतनी ही प्रबल।
पृथ्वी का असमान तापन एवं इसका घूर्णन सात दाब पेटियाँ बनाते हैं — विषुवतीय निम्न दाब (डोलड्रम्स, लगभग 0°), उपोष्ण कटिबंधीय उच्च दाब की दो पेटियाँ (30° उ. एवं 30° द. — हॉर्स लैटिट्यूड्स), उप-ध्रुवीय निम्न दाब की दो पेटियाँ (60° उ. एवं 60° द.) तथा दो ध्रुवीय उच्च दाब पेटियाँ।
इन्हीं दाब पेटियों से उत्पन्न होते हैं तीन स्थायी (ग्रहीय) पवन तंत्र। व्यापारिक पवनें उपोष्ण उच्च से विषुवतीय निम्न की ओर चलती हैं; उत्तरी गोलार्ध में उत्तर-पूर्वी एवं दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिण-पूर्वी। पछुआ पवनें (वेस्टरलीज़) उपोष्ण उच्च से उप-ध्रुवीय निम्न की ओर — उत्तरी गोलार्ध में दक्षिण-पश्चिमी, दक्षिणी गोलार्ध में उत्तर-पश्चिमी। ध्रुवीय पुरवैया (पोलर ईस्टरलीज़) ध्रुवीय उच्च से उप-ध्रुवीय निम्न की ओर चलती हैं। पवनों का सीधा मार्ग से विचलन कोरिऑलिस बल से होता है, जो पृथ्वी के घूर्णन का प्रभाव है।
ग्रहीय पवनों के अतिरिक्त मौसमी पवनें हैं जैसे दक्षिण एशिया के मानसून (दक्षिण-पश्चिम मानसून जून–सितंबर में भारत की वार्षिक वर्षा का 75–90% लाता है, उत्तर-पूर्व मानसून अक्टूबर–दिसंबर में तमिलनाडु को वर्षा देता है) तथा स्थानीय पवनें जैसे लू (उत्तर भारत की गरम-शुष्क ग्रीष्म पवन), आम्र वर्षा (केरल-कर्नाटक की मानसून-पूर्व बौछार), काल बैसाखी (बंगाल के उत्तर-पश्चिमी झंझावात) एवं तटीय थल-समुद्र समीर। CTET नियमित रूप से तीन ग्रहीय पवनों के नाम तथा मानसून पवनों की दिशा पूछता है।
पृथ्वी पर जल का वितरण
पृथ्वी की सतह का लगभग 71% भाग जल से ढका है, इसीलिए अंतरिक्ष से पृथ्वी नीली दिखती है। कुल जल की मात्रा विशाल है, परंतु इसका अधिकांश दैनिक मानवीय उपयोग के लिए अनुपयुक्त है।
पृथ्वी का लगभग 97% जल महासागरों एवं समुद्रों का खारा जल है। केवल लगभग 3% ही मीठा जल है। इस 3% का लगभग दो-तिहाई हिस्सा हिमनदों, बर्फीली टोपियों एवं ध्रुवीय बर्फ-चादरों में जमा है — मुख्यतः अंटार्कटिका एवं ग्रीनलैंड में। थोड़ा अंश जल-धारक चट्टानों में भूजल के रूप में है। पृथ्वी के कुल जल का 1% से भी कम ही झीलों, नदियों एवं मिट्टी में तरल मीठे जल के रूप में उपलब्ध है — यही जल हम पीने, सिंचाई एवं उद्योग में काम लाते हैं।
यही वितरण वैश्विक जल-संकट का कारण है। यद्यपि जल प्रचुर है, मीठा जल विरल है; और मीठा जल यद्यपि प्रत्येक महाद्वीप पर है, उसका वितरण असमान है। कुछ क्षेत्रों (अमेज़न बेसिन, दक्षिण एशिया की मानसून पट्टी) में अधिशेष है, अन्य (सहारा, मध्य एशिया, ऑस्ट्रेलिया के कुछ भाग) में सदा कमी।
भारत के पास विश्व जनसंख्या का लगभग 18% भाग है किंतु विश्व के मीठे जल का केवल लगभग 4%। मुख्य स्रोत हैं हिमालयी नदियाँ (गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र — सदाबहार, हिम-पोषित) एवं प्रायद्वीपीय नदियाँ (गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी, नर्मदा, तापी — वर्षा-पोषित एवं मौसमी)। उत्तरी मैदानों में भूजल का भारी उपयोग होता है। जल-प्रदूषण, भूजल का अति-दोहन एवं असमान पहुँच — ये जल-संरक्षण को सामाजिक अध्ययन की कक्षा का अति आवश्यक विषय बनाते हैं। CTET यहाँ दो तथ्य बार-बार पूछता है — 97% खारा / 3% मीठा का अनुपात, तथा यह तथ्य कि दो-तिहाई मीठा जल बर्फ में बंद है, अर्थात् पृथ्वी के कुल जल का 1% से भी कम तरल मीठा जल मनुष्य उपयोग करता है।
जल चक्र
महासागरों, वायुमंडल एवं भूमि के बीच जल का निरंतर गमन जल चक्र या जलीय चक्र कहलाता है। यह सूर्य की ऊर्जा एवं गुरुत्व से चलता है तथा पृथ्वी पर जल की कुल मात्रा को स्थिर रखता है।
चक्र की चार मुख्य प्रक्रियाएँ हैं। वाष्पीकरण — सूर्य की ऊष्मा से महासागरों, झीलों, नदियों एवं मिट्टी का तरल जल जल-वाष्प में बदलता है। पौधे वाष्पोत्सर्जन द्वारा वायु में और जल-वाष्प छोड़ते हैं — वाष्पीकरण और वाष्पोत्सर्जन को साथ मिलाकर वाष्पोत्सर्जन-वाष्पीकरण कहते हैं। जल-वाष्प गरम वायु के साथ ऊपर उठती है। संघनन — ऊपर उठती वायु ठंडी होकर जल-वाष्प को धूल-कणों के चारों ओर छोटी बूँदों में बदल देती है, जिससे बादल बनते हैं। जब बूँदें भारी हो जाती हैं तो वर्षा के रूप में गिरती हैं — पानी, हिम, ओला, स्लीट या ओस। इस जल का कुछ भाग नदियों से पुनः महासागर में पहुँचता है (अपवाह), कुछ भूमि में रिसकर भूजल बनता है (अंतःस्रवण), तथा कुछ पुनः वाष्पीकृत होकर अथवा पौधों द्वारा उपयोग होकर चक्र पुनः आरंभ करता है।
जल चक्र के प्राकृतिक कार्य अनेक हैं — स्थलीय भागों में मीठे जल का वितरण, अपरदन एवं निक्षेपण से भू-आकृतियों की रचना, महासागरों की लवणता का संधारण तथा जलवायु का नियमन। चक्र न हो तो सारा मीठा जल समुद्र में बह जाए और वर्षा न हो।
मानवीय गतिविधियाँ चक्र को विकृत करती हैं। वन-कटाव से वाष्पोत्सर्जन कम होता है, अपवाह बढ़ता है, निचले भागों में बाढ़ एवं ऊपरी भागों में सूखा। कंक्रीट-नगर अंतःस्रवण घटा देते हैं, भूजल-स्तर गिरता है। वायु-प्रदूषण वर्षा की रसायन-संरचना बदल देता है (अम्ल वर्षा)। वैश्विक तापन चक्र को तीव्र करता है — अधिक वाष्पीकरण, कहीं भारी वर्षा, कहीं लंबा सूखा। कक्षा-गतिविधियाँ — ठंडी थाली पर भाप का संघनन प्रदर्शित करना, चक्र का अंकित चित्र बनाना, विद्यालय परिसर में वर्षा-जल का अनुगमन — अमूर्त चक्र को मूर्त बनाती हैं। CTET के प्रश्न प्रायः चक्र को स्थानीय उदाहरणों — पश्चिमी घाटों पर बादल, प्रायद्वीपीय नदियों में मानसून जल — से जोड़ते हैं।
महासागर एवं समुद्री धाराएँ
विश्व में पाँच महासागर हैं। आकार के क्रम में — प्रशांत महासागर (सबसे बड़ा, पृथ्वी सतह का लगभग एक-तिहाई; इसी में मारियाना खाई — लगभग 11,000 मीटर गहरी — विश्व का सबसे गहरा ज्ञात बिंदु), अटलांटिक महासागर (S-आकार का, अमेरिका एवं यूरोप-अफ्रीका के बीच), हिन्द महासागर (किसी देश के नाम पर रखा गया एकमात्र महासागर), दक्षिणी महासागर या अंटार्कटिक (IHO द्वारा 2000 में आधिकारिक मान्यता प्राप्त — अंटार्कटिका के चारों ओर) तथा आर्कटिक महासागर (सबसे छोटा एवं उथला, उत्तरी ध्रुव के चारों ओर एवं आंशिक रूप से बर्फ से ढका)। हिन्द महासागर भारत को तीन ओर से घेरता है — दक्षिण, पूर्व (बंगाल की खाड़ी) एवं पश्चिम (अरब सागर)।
महासागरीय जल खारा मुख्यतः इसलिए है क्योंकि नदियाँ चट्टानों से घुले लवण लाती हैं तथा महासागरों ने करोड़ों वर्षों में इन्हें एकत्र किया है। औसत लवणता लगभग 35 ग्राम प्रति लीटर है। बहु-वाष्पीकरण वाले बंद समुद्रों में (मृत सागर, लाल सागर) लवणता अधिक है, तथा जहाँ अनेक नदियाँ मिलती हैं (बाल्टिक सागर, बंगाल की खाड़ी) कम।
महासागरीय जल तीन प्रकार से गतिशील रहता है — पवन से उत्पन्न तरंगें, चंद्रमा एवं सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से उत्पन्न ज्वार-भाटा, तथा पवन-लवणता-ताप के अंतर से उत्पन्न धाराएँ। गरम धाराएँ भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर बहती हैं (अटलांटिक में गल्फ स्ट्रीम, प्रशांत में क्यूरोशियो) तथा जिन तटों से गुजरती हैं उनका तापमान बढ़ा देती हैं; उत्तर अटलांटिक प्रवाह के कारण ब्रिटिश द्वीप अपने अक्षांश की तुलना में सौम्य हैं। ठंडी धाराएँ ध्रुवों से भूमध्य रेखा की ओर बहती हैं (लैब्राडोर, पेरू के पास हम्बोल्ट, नामीबिया के पास बेंगुएला); ये पोषक तत्व लाती हैं किंतु तटीय जलवायु ठंडी कर देती हैं। जहाँ गरम एवं ठंडी धाराएँ मिलती हैं वहाँ मछली का खज़ाना बनता है — जैसे न्यूफ़ाउंडलैंड के पास ग्रांड बैंक्स एवं जापान के तट।
ज्वार-भाटा से सागर-तल दैनिक रूप से चढ़ता-उतरता है। वृहत् ज्वार (स्प्रिंग टाइड) सर्वाधिक होते हैं — पूर्णिमा एवं अमावस्या को जब सूर्य, पृथ्वी एवं चंद्रमा एक रेखा में होते हैं। लघु ज्वार (नीप टाइड) न्यूनतम होते हैं, जब सूर्य एवं चंद्रमा पृथ्वी के साथ समकोण बनाते हैं। ज्वार-भाटा नौ-संचालन, मत्स्य-पालन, ज्वारनदमुख की सफाई एवं अब ज्वारीय विद्युत-उत्पादन में सहायक हैं।
जलवायु परिवर्तन एवं वैश्विक तापन
जलवायु परिवर्तन का अर्थ है औसत मौसम-स्वरूप में दीर्घकालिक परिवर्तन। वैश्विक तापन इसका एक विशिष्ट रूप है — पृथ्वी के औसत सतह-तापमान में 19वीं सदी के अंत से होती जा रही निरंतर वृद्धि। औद्योगिक काल से अब तक पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 1.1°C बढ़ चुका है, और 1970 के बाद से तापन की गति तीव्र हुई है।
मुख्य कारण है अतिरंजित हरितगृह प्रभाव। कारखानों, बिजली-घरों, वाहनों एवं घरों में कोयला, तेल एवं प्राकृतिक गैस का दहन वायुमंडल में विशाल मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ता है। मीथेन धान के खेत, पशु एवं कूड़े के ढेर से आती है। वन-कटाव कार्बन डाइऑक्साइड के प्राकृतिक अवशोषण को घटा देता है। ये गैसें पृथ्वी से लौटती ऊष्मा को निचले वायुमंडल में अधिक रोक लेती हैं — मानो ग्रह पर अतिरिक्त कंबल।
दृश्यमान संकेत सर्वत्र हैं। हिमालयी एवं ध्रुवीय हिमनद पिघलते जा रहे हैं; सागर-तल बढ़ने से मुंबई, कोलकाता एवं सुंदरबन सहित निचले तट खतरे में हैं; चरम मौसमी घटनाएँ बढ़ रही हैं — लू, मेघ-विस्फोट, चक्रवात (अम्फान 2020, ताऊते 2021), कहीं लंबा सूखा, कहीं बाढ़; मानसून-स्वरूप बदल रहा है; फसलें घट रही हैं; तथा हिम-तेंदुआ, ध्रुवीय भालू एवं प्रवाल भित्तियाँ खतरे में हैं।
अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया UNFCCC (रियो पृथ्वी शिखर-सम्मेलन 1992) तथा पेरिस समझौता (2015) के इर्द-गिर्द है, जिसमें देशों ने तापन को 2°C से अच्छे से नीचे — आदर्श रूप से 1.5°C — रखने का संकल्प लिया। भारत ने 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का संकल्प लिया है तथा फ्रांस के साथ अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन शुरू किया है। व्यक्तिगत स्तर पर '3 R' — घटाएँ, पुनः उपयोग करें, पुनर्चक्रित करें — के साथ बिजली बचाना, वृक्षारोपण, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग एवं मांस-उपभोग में कमी — ये सब सहायक हैं। SST कक्षा में जलवायु परिवर्तन को 'दूर भविष्य' का विषय न मानकर वर्तमान वास्तविकता मानें जो भारतीय नदियों, फसलों एवं तटों को अभी प्रभावित कर रही है। CTET यहाँ शिक्षण-पद्धति प्रश्न प्रायः जोड़ता है — 'निराशा पैदा किए बिना जलवायु परिवर्तन कैसे पढ़ाएँ?' उत्तर है कि केवल खतरे पर नहीं, समाधान एवं क्रिया पर बल दें।
प्रयोगों से वायु एवं जल पढ़ाना
वायु एवं जल मूर्त हैं, किंतु एक अदृश्य (वायु) तथा दूसरा निरंतर रूप बदलता (जल) है। सर्वोत्तम शिक्षण विधि है — केवल शब्दों से वर्णन न करके हाथों से प्रयोग द्वारा इन्हें दृश्यमान बनाना।
यह सिद्ध करने के लिए कि वायु का भार होता है तथा वह दाब डालती है — दो समान आकार के गुब्बारे फुलाकर एक मध्य-संतुलित छड़ के सिरों पर लटकाएँ; वे संतुलन में रहते हैं। अब एक गुब्बारा फोड़ दें; छड़ फुले हुए गुब्बारे की ओर झुक जाती है क्योंकि उसमें भरी वायु का भार है। दाब दिखाने के लिए — एक गिलास को छलकाते तक जल से भर दें, एक कड़े कागज़ से ढककर उलटा कर दें; कागज़ नीचे नहीं गिरता, क्योंकि नीचे से वायुमंडलीय दाब ऊपर के जल के भार से अधिक है। यह दिखाने के लिए कि वायु स्थान घेरती है — एक उलटे गिलास को सीधा जल-पात्र में डुबोएँ; जल भीतर नहीं जाता क्योंकि उसमें पहले से वायु भरी है।
जल चक्र के लिए — एक बड़े कटोरे में एक छोटा कप जल रखें, ऊपर क्लिंग-फ़िल्म चढ़ाएँ, बीच में एक पत्थर रखकर हल्का गड्ढा बनाएँ, धूप में रख दें। जल वाष्पित होकर फिल्म पर संघनित होगा एवं खाली स्थान में टपक जाएगा। बालक एक ही उपकरण में वाष्पीकरण, संघनन एवं वर्षा देखते हैं।
मौसम-अवलोकन हेतु कक्षा एक स्केल-युक्त बोतल से सरल वर्षा-मापी, सूई पर कागज़ के तीर से पवन-दिशा-सूचक, तथा दैनिक रीडिंग के लिए तापमान-चार्ट बना सकती है। एक माह के आँकड़े एक छोटे दंड-आरेख में बदल जाएँ — भूगोल एवं गणित का एकीकरण।
समुद्री धाराओं के लिए — ठंडे जल की थाली में एक कोने पर रंगा गरम जल छोड़ने पर बालक देखते हैं कि गरम तरल ऊपर उठकर सतह के साथ चलता है — गल्फ स्ट्रीम जैसी गरम धारा का प्रतिरूप। स्थानीय तालाब, नदी या टैंक का भ्रमण, भारतीय मानसून के वीडियो, एवं दैनिक समाचार-पत्र की मौसम-रिपोर्ट — पाठ्यपुस्तकीय शिक्षा को जीवंत बनाते हैं। NCF 2005 जोर देता है कि क्रिया, अवलोकन एवं संवाद — रटी हुई परिभाषाएँ नहीं — भूगोल शिक्षण का हृदय हैं। इस अध्याय के CTET शिक्षण-पद्धति प्रश्न प्रायः उसी विकल्प को सही बताते हैं जिसमें विद्यार्थी द्वारा अन्वेषण, चित्र-निर्माण एवं स्थानीय अनुभव से जोड़ना सम्मिलित हो।
अभ्यास प्रश्न
Q1. भारत में शरद ऋतु के संबंध में कथन A, B और C पर विचार कीजिए और सही विकल्प का चयन कीजिए: A. इस मौसम को दक्षिण-पश्चिम मानसून के नाम से भी जाना जाता है। B. इस मौसम में पवन, बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर से स्थल की ओर बहती हैं। C. यह मौसम मानसून के आने तथा आगे बढ़ने का मौसम है।
व्याख्या: दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून–सितंबर) उन पवनों के नाम पर है जो अरब सागर एवं बंगाल की खाड़ी से स्थल की ओर बहती हैं, तथा यह 1 जून के आसपास केरल पर 'आरंभ' होता है। अतः A एवं C सत्य हैं। आधिकारिक CTET कुंजी ने B को असत्य माना क्योंकि इसका विवरण अधूरा है — दक्षिण-पश्चिम मानसून हिन्द महासागर से भी उत्पन्न होता है, केवल बंगाल की खाड़ी एवं अरब सागर से नहीं।
स्रोत: CTET Jan 2021 P2, Q31
Q2. दिए गए लक्षणों A और B के आधार पर वायुमंडलीय परत की पहचान करें: A. अंतरिक्ष से प्रवेश करते सारे उल्का-पिंड इस परत में आने पर जल जाते हैं। B. इस परत में बढ़ती ऊंचाई के साथ तापमान घटता है।
व्याख्या: उल्का-पिंड वायुमंडल में प्रवेश कर मध्यमंडल में जलते हैं, तथा मध्यमंडल में ऊँचाई बढ़ने पर तापमान घटता है — इस आधार पर सही उत्तर मध्यमंडल होना चाहिए। CTET आधिकारिक कुंजी ने समतापमंडल अंकित किया है; अभ्यर्थी आधिकारिक कुंजी का पालन करें परंतु ध्यान दें कि NCERT उल्का-दहन को स्पष्टतः मध्यमंडल में रखता है।
स्रोत: CTET Jan 2021 P2, Q33
Q3. आतपन का संबंध है -
व्याख्या: आतपन (Insolation) = 'Incoming solar radiation' अर्थात् पृथ्वी के पृष्ठ पर प्रति इकाई क्षेत्र पर प्राप्त सौर ऊर्जा। यह तापमान, दाब अंतर, पवनों एवं सम्पूर्ण मौसम-तंत्र का मूल चालक है। NCERT कक्षा 7 (हमारा पर्यावरण) में यह शब्द सीधे प्रयोग होता है।
स्रोत: CTET Jan 2021 P2, Q34
Q4. निम्नलिखित कथनों (A) एवं (R) के आधार पर सही विकल्प का चयन कीजिए। कथन (A): महासागर का जल लवणीय या खारा होता है। कारण (R): महासागर के जल में बड़ी मात्रा में घुले हुए लवण होते हैं।
व्याख्या: महासागरीय जल खारा है क्योंकि उसमें घुले हुए लवण — मुख्यतः सोडियम क्लोराइड एवं साथ में मैग्नीशियम, कैल्शियम तथा पोटेशियम के लवण — हैं जो नदियों ने करोड़ों वर्षों में चट्टानों से लाकर भरे हैं। औसत लवणता लगभग 35 ग्राम/लीटर है। अतः A एवं R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है।
स्रोत: CTET Dec 2022 P2 (28 Dec), Q51
Q5. पृथ्वी की सतह से ऊपर की ओर वायुमंडल की परतों का सही क्रम क्या है?
व्याख्या: पृथ्वी की सतह से ऊपर पाँच परतों का क्रम है — क्षोभमंडल (0–18 किमी, मौसम), समतापमंडल (50 किमी तक, ओज़ोन), मध्यमंडल (80 किमी तक, उल्का-दहन), तापमंडल (~400 किमी तक, आयनमंडल एवं अरोरा) तथा बाह्यमंडल (सबसे बाहरी विरल परत जो अंतरिक्ष में मिलती है)। NCERT कक्षा 7 में यही क्रम दिया गया है।
स्रोत: Practice Question