सामाजिक अध्ययन · CTET नोट्स

कंपनी शासन की स्थापना एवं ग्रामीण जीवन | CTET SST P2

1757 ई० के प्लासी युद्ध से लेकर 1857 के विद्रोह तक, अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय उपमहाद्वीप पर एक ‘व्यापारिक संगठन से शासन-शक्ति’ बनकर शिकंजा कसा। बंगाल के दीवानी अधिकार (1765) से लेकर लॉर्ड कॉर्नवालिस के स्थायी बंदोबस्त (1793), रैयतवारी, महलवारी, नील-विद्रोह, संथाल-विद्रोह, चंपारण के बागानी संकट तक — कंपनी-शासन का प्रभाव भारत के ग्रामीण जीवन, बुनकरों एवं किसानों पर गहरा था। CTET पेपर 2 में इस इकाई से प्रायः 2–3 प्रश्न आते हैं — विशेषकर सहायक संधि (वेलेज़ली), घुमंतू कृषि की क्षेत्रीय शब्दावली (जुम, पेन्डा, बेवर), तथा भू-राजस्व व्यवस्थाओं पर। यह पाठ NCERT कक्षा 8 ‘हमारे अतीत — III’ एवं NIOS 509 खंड 2 इकाई 3 पर आधारित है।

COMPANY RULE

ईस्ट इंडिया कंपनी का उदय

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 31 दिसंबर 1600 को महारानी एलिज़ाबेथ-I के राज-चार्टर द्वारा हुई। प्रारंभ में यह केवल मसाला-व्यापार के लिए संगठित संयुक्त-पूँजी कंपनी थी, जिसका पहला जहाज़ कैप्टन हॉकिंस के नेतृत्व में 1608 में जहाँगीर के दरबार पहुँचा। 1611–13 के बीच सूरत, फिर 1639 में मद्रास (फोर्ट सेंट जॉर्ज), 1664 में बम्बई (पुर्तगाली दहेज), तथा 1690 में कलकत्ता (फोर्ट विलियम) — चार प्रमुख कोठियाँ स्थापित हुईं।

उसी काल में डच, पुर्तगाली, फ़्रांसीसी, डैनिश एवं स्वीडिश कंपनियाँ भी भारत में सक्रिय थीं। 18वीं शताब्दी के मध्य कर्नाटक के तीन युद्धों (1746–63) में अंग्रेज़ों ने फ़्रांसीसियों को परास्त किया, जिसमें राबर्ट क्लाइव एवं स्ट्रिंगर लॉरेंस की भूमिका निर्णायक रही।

17वीं शताब्दी के अंत तक मुग़ल साम्राज्य के क्षेत्रीय विघटन ने कंपनी को ‘व्यापारी से सत्ता’ बनने का अवसर दिया। बंगाल का नवाब सिराजुद्दौला (1756) से कंपनी का तीव्र संघर्ष यहीं से आरंभ हुआ।

प्लासी एवं बक्सर के युद्ध — सत्ता का हस्तांतरण

23 जून 1757 — प्लासी का युद्ध: रॉबर्ट क्लाइव बनाम बंगाल का नवाब सिराजुद्दौला। यह वस्तुतः युद्ध कम, षड्यंत्र अधिक था — मीर जाफ़र (सेनापति), जगत सेठ (वित्तीय), उमीचंद, राय दुर्लभ ने नवाब से विश्वासघात किया। परिणामस्वरूप कंपनी ने मीर जाफ़र को नवाब बनाया और बंगाल के राजस्व पर पकड़ कायम की।

22 अक्टूबर 1764 — बक्सर का युद्ध: कंपनी (हेक्टर मुनरो) बनाम तीन शक्तियाँ — मीर कासिम (अवध-निर्वासित नवाब), शुजाउद्दौला (अवध), शाह आलम-II (मुग़ल सम्राट)। तीनों परास्त। 1765 की इलाहाबाद की संधि द्वारा शाह आलम-II ने कंपनी को बंगाल, बिहार एवं ओडिशा की दीवानी (राजस्व-वसूली का अधिकार) प्रदान की।

इस ‘दोहरी सरकार’ (1765–72) में कंपनी के पास दीवानी (राजस्व) थी और निज़ामत (प्रशासन) नाममात्र नवाब के पास। 1772 में वारेन हेस्टिंग्स ने इस द्वैध-शासन को समाप्त कर पूर्ण कंपनी-शासन स्थापित किया।

नीतिगत साधन (NCERT कक्षा 8): सहायक संधि (वेलेज़ली, 1798), विलय-सिद्धांत/डॉक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स (डलहौज़ी, 1848), भेद-नीति, हस्तक्षेप (पैरामाउन्टसी)।

स्थायी बंदोबस्त — कॉर्नवालिस की ज़मींदारी

1793 ई० में लॉर्ड कॉर्नवालिस ने बंगाल, बिहार, ओडिशा में स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement) लागू किया। इसके मुख्य अंश:

  • पुराने राजा-ज़मींदारों को भूमि के औपचारिक स्वामी (proprietor) माना गया।
  • उन्हें एक निश्चित राशि स्थायी रूप से कंपनी को राजस्व के रूप में देनी थी — 10/11 कंपनी को, 1/11 ज़मींदार को।
  • राशि स्थायी (permanent) थी — कभी न बढ़े, न घटे, चाहे फ़सल कुछ भी हो।
  • नियत-तिथि पर भुगतान न होने पर भूमि नीलाम कर दी जाती (‘सूर्यास्त-नियम’ — sunset law)।

परिणाम: राशियाँ अत्यधिक थीं, बहुत से पुराने ज़मींदार नीलामी में डूब गए और शहरी सूदखोरों ने भूमि खरीद ली। किसान उप-राजस्व-दर के बोझ में दब गए, क्योंकि नए ज़मींदार उत्पाद का 80–90% तक खींच लेते थे। ‘अधीन-ज़मींदार’ (sub-infeudation) की लंबी श्रृंखला बनी।

रैयतवारी एवं महलवारी — दक्षिण एवं उत्तरी व्यवस्थाएँ

स्थायी बंदोबस्त की कमियों को देखते हुए दो वैकल्पिक व्यवस्थाएँ विकसित हुईं:

1. रैयतवारी व्यवस्थाथॉमस मुनरो (मद्रास, 1820) एवं एलेक्ज़ेंडर रीड। प्रत्यक्ष किसान (रैयत) के साथ अनुबंध; मध्य-स्थ ज़मींदार नहीं। राजस्व-दर 30-वर्षीय पुनर्निरीक्षण योग्य। मद्रास एवं बम्बई-प्रेसीडेंसी में लागू।

2. महलवारी व्यवस्थाहॉल्ट मैकेंज़ी एवं विलियम बेंटिंक, 1822 → 1833। राजस्व ‘महल’ (गाँव) के स्तर पर तय; गाँव का मुखिया (लंबरदार) सामूहिक रूप से उत्तरदायी। उत्तर भारत — पंजाब, NWP (वर्तमान UP), अवध, मध्य भारत।

दोनों व्यवस्थाओं की कठोरताओं ने नकद-फसल (cash crop) पर निर्भरता बढ़ा दी — किसान भोजन की जगह नील, अफ़ीम, कपास उगाने को विवश हुए ताकि नक़दी से कर चुका सकें।

व्यवस्थाअनुबंध-स्तरक्षेत्रप्रवर्तक
स्थायी बंदोबस्तज़मींदारबंगाल/बिहार/ओडिशाकॉर्नवालिस 1793
रैयतवारीव्यक्तिगत किसानमद्रास/बम्बईथॉमस मुनरो 1820
महलवारीगाँव/महलउत्तर भारतमैकेंज़ी 1822

किसान विद्रोह एवं आदिवासी विद्रोह

कंपनी की भू-राजस्व नीति ने किसानों एवं आदिवासियों को अनेक विद्रोहों के लिए मजबूर किया।

आदिवासी विद्रोह (NCERT कक्षा 8 ‘हमारे अतीत — III’ अध्याय 4):

  • कोल विद्रोह (छोटानागपुर, 1831–32) — दीकू (बाहरी) ज़मींदारों के विरुद्ध।
  • संथाल विद्रोह (राजमहल, 1855–56) — सिद्धू एवं कान्हू मुर्मू के नेतृत्व में; ज़मींदार, सूदखोर एवं कंपनी-तंत्र के विरुद्ध।
  • मुंडा विद्रोह (1899–1900) — बिरसा मुंडा के ‘उलगुलान’ (महान विद्रोह); भूमि-व्यवस्था एवं धार्मिक-सांस्कृतिक स्वायत्तता।
  • भील विद्रोह (खानदेश, 1818–31), कोली विद्रोह, राम्पा विद्रोह (आंध्र, 1922–24 — अल्लूरी सीताराम राजू)।

स्थानांतरित कृषि की क्षेत्रीय शब्दावली (CTET PYQ आधार):

  • मध्य प्रदेश — बेवर / पेन्डा
  • ओडिशा — पोडू
  • आंध्र प्रदेश — पोडू / पुनम
  • उत्तर-पूर्व भारत — झूम / जुम
  • केरल — पुनम कृषि

नील-विद्रोह एवं बागान अर्थव्यवस्था

यूरोप की कपड़ा-उद्योग ने 18वीं शताब्दी से नील (indigo) की भारी माँग पैदा की। कंपनी ने बंगाल के किसानों को ‘नीलहों’ (नील-उत्पादक) के अधीन नील उगाने को बाध्य किया। दो प्रणालियाँ:

  • निज प्रणाली (Nij) — नीलह (अंग्रेज़ बागान-मालिक) स्वयं ज़मीन पट्टे पर लेकर भाड़े के मज़दूरों से उगाते।
  • रैयती प्रणाली (Ryoti) — किसान ‘सत्ता-संधि’ (दादन-नक़दी अग्रिम) पर हस्ताक्षर कर अपनी ज़मीन पर नील उगाने को मजबूर। अनुबंध एकतरफ़ा थे; मूल्य अति-न्यून; कर्ज़ कभी न चुकता।

1859–60 का नील-विद्रोह (बंगाल, चंपारण, बारासात): किसानों ने सामूहिक रूप से नील-बुआई से इनकार किया। बंगाली बुद्धिजीवियों — दीनबंधु मित्र का नाटक ‘नील दर्पण’ (1860) — ने जनमत बनाया। 1860 के नील-कमीशन ने अनिच्छुक स्वीकार्यता दी कि व्यवस्था ज़ुल्म-पूर्ण थी।

चंपारण सत्याग्रह (1917) गांधी का प्रथम भारतीय सत्याग्रह था, इन्हीं ‘तिन-कठिया’ (3/20 भूमि पर बलात् नील-कृषि) प्रथा के विरुद्ध। यह नील-शोषण की अंतिम कड़ी थी।

लोहा-गलाई, हस्तकरघा एवं उपनिवेशकालीन शिल्प-पतन

उपनिवेश-पूर्व भारत वस्त्र, लोहा, इस्पात, मसाला उद्योग में विश्व-अग्रणी था। ढाका की मलमल, मसुलीपट्टनम का कलमकारी, सूरत का सूती कपड़ा, कश्मीर का शाल — सब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार के लिए जाते थे।

19वीं शताब्दी में अनेक कारकों से इन शिल्पों का पतन हुआ:

  1. मैनचेस्टर का मशीन-निर्मित कपड़ा भारत में सस्ता आ रहा था (भारत के कच्चे माल का यूरोप में सस्ता रूपांतरण)।
  2. भारतीय वस्त्रों पर ब्रिटेन में भारी टैरिफ़।
  3. कंपनी की दबाव-वाली खरीद (forced contracts) ने बुनकरों को अपने ही कुएँ खोदने को मजबूर किया।
  4. तंती’ (बुनकर) को कम मज़दूरी मिली; अनेक खेती की ओर लौट गए।

लोहा-गलाई पर NCERT अध्याय (अगरिया जनजाति, मध्य भारत) में बताया गया है कि वन-नियम (Forest Laws, 1865) ने पारंपरिक लोहा-गलनकर्ताओं की लकड़ी-कोयला तक पहुँच रोक दी; ब्रिटिश आयातित लोहा (टाटा-पूर्व) ने स्थानीय लोहारों को विस्थापित किया। यह औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था का विउद्योगीकरण (deindustrialisation) था।

स्थानीय स्रोतों से औपनिवेशिक इतिहास पढ़ाना

NCF 2005 एवं NIOS 509 खंड 2 (इतिहास-शिक्षण) पाठ्यपुस्तक के साथ-साथ स्थानीय एवं पारिवारिक स्रोतों के उपयोग की वकालत करते हैं।

कक्षा-गतिविधियाँ (कक्षा 8 शिक्षक-संदर्शिका):

  • अपने ग्राम/जिले में कंपनी-काल के पुराने मंदिर, खंडहर, क़िले, पुराने नाम — फ़ील्ड-विज़िट।
  • घर के बुज़ुर्गों से ‘1857 की कहानियाँ’ — मौखिक इतिहास (oral history) पद्धति।
  • ‘नील दर्पण’ या ‘अमर चित्र कथा’ के नील-विद्रोह वाले अंक की कक्षा-नाट्य-प्रस्तुति।
  • स्थानीय मंडी में आज की कीमत बनाम कंपनी-काल की राजस्व-दर — अंकगणितीय तुलना।
  • कंपनी के रेखाचित्र, चित्र, सिक्के — दृश्य-स्रोतों का प्रयोग।
CTET-संकेत: ‘बच्चों को इतिहासकार बनाएँ’ — स्रोत-विश्लेषण, बहु-दृष्टि, स्थानीय जुड़ाव यही NCF का इतिहास-शिक्षण-दर्शन है। प्रश्न इसी दृष्टिकोण की पहचान पर केंद्रित रहते हैं।

अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित में से कौनसा शब्द मध्य प्रदेश में 'घुमंतू खेती' के लिए इस्तेमाल होता था?

  • बीघा
  • बेवड़
  • बैगा
  • महल

व्याख्या: मध्य प्रदेश में स्थानांतरित (झूमिंग) कृषि के लिए ‘बेवर’ शब्द प्रचलित है (NCERT कक्षा 8 ‘हमारे अतीत — III’ अध्याय 4)। ‘पोडू’ ओडिशा/आंध्र में, ‘झूम/जुम’ पूर्वोत्तर में, ‘पुनम’ केरल में प्रयुक्त है। विकल्प सूची के अनुसार सही उत्तर: ‘बेवर’ अथवा ‘पेन्डा’।

स्रोत: CTET Dec 2022 P2 (28 Dec), Q37

Q2. (A) और (B) कथनों पर 'सहायक संधि' के संदर्भ में विचार कीजिए और सही विकल्प का चयन कीजिए। (A) भारतीय शासकों को अपनी स्वतंत्र सशस्त्र सेना रखने की अनुमति थी। (B) भारतीय शासकों को ईस्ट इंडिया कंपनी को भुगतान करना पड़ता था।

  • (A) और (B) दोनों सही हैं।
  • (A) और (B) दोनों गलत हैं।
  • (A) सही है लेकिन (B) गलत है।
  • (A) गलत है लेकिन (B) सही है।

व्याख्या: सहायक संधि (Subsidiary Alliance) लॉर्ड वेलेज़ली (1798) की नीति थी। इसके अंतर्गत देशी रियासत को (i) अपनी सेना भंग कर ब्रिटिश सेना रखनी पड़ती थी, (ii) उसका खर्च वहन करना पड़ता था, (iii) ब्रिटिश रेज़िडेंट दरबार में नियुक्त होता था, (iv) विदेश-नीति ब्रिटिश के अधीन। हैदराबाद इसे स्वीकार करने वाली पहली रियासत थी। दोनों कथन सही हैं और एक दूसरे का स्पष्टीकरण देते हैं।

स्रोत: CTET Dec 2022 P2 (28 Dec), Q43

Q3. लॉर्ड कॉर्नवालिस के 1793 के ‘स्थायी बंदोबस्त’ के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?

  • यह व्यक्तिगत किसान (रैयत) के साथ अनुबंध थी।
  • ज़मींदार को भू-स्वामी मानकर एक निश्चित राशि स्थायी रूप से तय की गई थी।
  • यह व्यवस्था मद्रास-प्रेसीडेंसी में लागू की गई थी।
  • इसमें राजस्व-राशि प्रत्येक 30 वर्ष पर पुनर्निर्धारित होती थी।

व्याख्या: स्थायी बंदोबस्त बंगाल/बिहार/ओडिशा में ज़मींदार को भू-स्वामी मानकर एक स्थायी राशि तय करती थी। रैयतवारी (मुनरो, मद्रास, 1820) किसान-स्तर पर थी; महलवारी गाँव-स्तर पर। 30-वर्षीय पुनरीक्षण रैयतवारी का लक्षण है। अतः (2) सही।

स्रोत: Practice Question (NCERT कक्षा 8 ‘हमारे अतीत — III’)

Q4. ‘उलगुलान’ (महान विद्रोह) किसके नेतृत्व में हुआ था?

  • सिद्धू एवं कान्हू मुर्मू
  • बिरसा मुंडा
  • अल्लूरी सीताराम राजू
  • तिलका माँझी

व्याख्या:उलगुलान’ (1899–1900) बिरसा मुंडा के नेतृत्व में छोटानागपुर के मुंडा आदिवासियों का विद्रोह था। संथाल-विद्रोह (1855–56) सिद्धू-कान्हू मुर्मू ने चलाया, राम्पा विद्रोह (1922–24) अल्लूरी सीताराम राजू ने, और तिलका माँझी का संथाल नेतृत्व बहुत पहले 1784 में था। (NCERT कक्षा 8)। अतः (2) सही।

स्रोत: Practice Question (NCERT कक्षा 8)

Q5. नील-कृषि की ‘रैयती प्रणाली’ की विशेषता क्या थी?

  • नीलह स्वयं ज़मीन पट्टे पर लेकर भाड़े के मज़दूरों से नील उगवाते थे।
  • किसान ‘सत्ता-संधि’ (अग्रिम-नक़द) पर हस्ताक्षर कर अपनी ज़मीन पर नील उगाने को बाध्य होते थे।
  • यह व्यवस्था केवल मद्रास-प्रेसीडेंसी में लागू थी।
  • किसानों को नील का अंतरराष्ट्रीय बाज़ार-मूल्य मिलता था।

व्याख्या: ‘रैयती’ प्रणाली में किसान को नीलह से एक दादन (अग्रिम राशि) मिलती थी; इसके बदले वह अपनी ज़मीन के एक भाग पर नील उगाने को बाध्य था। मूल्य अति-न्यून, कर्ज़ कभी न चुकता; यह 1859 के नील-विद्रोह का तत्काल कारण बना। ‘निज’ प्रणाली पहले विकल्प में वर्णित है। NCERT कक्षा 8, हमारे अतीत-III, अध्याय 3। अतः (2) सही।

स्रोत: Practice Question (NCERT कक्षा 8)