सौरमंडल में पृथ्वी
सूर्य, आठ ग्रह, उनके उपग्रह, क्षुद्रग्रह तथा उल्का-पिंड मिलकर सौरमंडल बनाते हैं। सूर्य समस्त ऊष्मा एवं प्रकाश का स्रोत है। सूर्य से दूरी के क्रम में आठ ग्रह हैं — बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, अरुण (यूरेनस) तथा वरुण (नेपच्यून)। पहले प्लूटो को नौवाँ ग्रह माना जाता था, परंतु 2006 में अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) ने उसे बौना ग्रह घोषित कर दिया — NCERT कक्षा 6 की पाठ्यपुस्तक में यह नवीनतम तथ्य है।
बुध सूर्य के सबसे निकट है; बृहस्पति सबसे बड़ा ग्रह है। पृथ्वी सूर्य से तीसरा ग्रह है तथा अब तक ज्ञात एकमात्र ग्रह है जहाँ जीवन है। पृथ्वी पर जीवन की तीन शर्तें — सूर्य से उचित दूरी जो तापमान को न अधिक गर्म न अधिक ठंडा रखती है, द्रव-जल की उपस्थिति, तथा ऑक्सीजन-युक्त वायुमंडल।
अंतरिक्ष से पृथ्वी नीली दिखाई देती है क्योंकि इसकी दो-तिहाई सतह जल से ढकी है — इसीलिए इसे 'नीला ग्रह' कहते हैं। चंद्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है। यह पृथ्वी से लगभग 3,84,400 किमी दूर है। इसका व्यास पृथ्वी के व्यास का लगभग एक-चौथाई है। चंद्रमा पर वायुमंडल, जल या जीवन नहीं है। चंद्रमा पृथ्वी की एक परिक्रमा तथा अपनी धुरी पर एक घूर्णन — दोनों लगभग 27 दिन में पूरा करता है, इसलिए हम सदा उसका एक ही पक्ष देखते हैं।
ग्रहों से छोटे, सूर्य की परिक्रमा करने वाले पिंड क्षुद्रग्रह (asteroids) कहलाते हैं; अधिकांश मंगल एवं बृहस्पति के बीच की पट्टी में हैं। अंतरिक्ष में भ्रमण करते छोटे पत्थर के टुकड़े उल्का-पिंड हैं; पृथ्वी के वायुमंडल में जलते समय जो प्रकाश-रेखा दिखती है उसे 'टूटा तारा' कहते हैं। आकाशगंगा करोड़ों तारों का विशाल समूह है; हमारी आकाशगंगा का नाम 'मिल्की-वे' अथवा 'आकाश गंगा' है। सम्पूर्ण आकाशगंगाओं को मिलाकर ब्रह्मांड बनता है। शिक्षक को सूर्य-ग्रह-उपग्रह की पदानुक्रम स्पष्ट रखनी चाहिए क्योंकि CTET प्रायः यही जाँचता है कि विद्यार्थी किस पिंड को किस श्रेणी में रखता है।
पृथ्वी का आकार एवं माप
प्राचीन लोग पृथ्वी को चपटी मानते थे। यूनानी विचारकों — पाइथागोरस तथा अरस्तू — ने तर्क दिया कि पृथ्वी गोल है क्योंकि चंद्र-ग्रहण के समय चंद्रमा पर पड़ने वाली पृथ्वी की छाया गोल होती है, तथा क्षितिज पर जहाज पहले निचले भाग से ओझल होते हैं। बीसवीं सदी में अंतरिक्ष से ली गई छायाचित्रों ने इसकी पुष्टि की।
वस्तुतः पृथ्वी पूर्ण गोल नहीं है। अपनी घूर्णन गति के कारण यह ध्रुवों पर कुछ चपटी एवं भूमध्य रेखा पर कुछ उभरी हुई है। इस आकार को लध्वक्ष गोलाभ (oblate spheroid) कहते हैं। ध्रुवीय व्यास (लगभग 12,714 किमी) विषुवतीय व्यास (लगभग 12,756 किमी) से लगभग 42 किमी कम है। भूमध्यरेखीय परिधि लगभग 40,075 किमी है।
पृथ्वी का आकार जीवन के लिए महत्वपूर्ण है। यदि यह बुध जितनी छोटी होती तो दुर्बल गुरुत्व वायुमंडल को रोक नहीं पाता। यदि बृहस्पति जितनी बड़ी होती तो गुरुत्व इतना तीव्र होता कि कोई स्थलीय प्राणी सीधा खड़ा न रह पाता। पृथ्वी का द्रव्यमान एवं गुरुत्व गैसों की एक पतली परत — वायुमंडल — को सतह से बाँधे रखते हैं, जो हानिकारक विकिरण से रक्षा एवं उचित ताप-संरक्षण करता है।
कक्षा में पृथ्वी का प्रतिरूप ग्लोब है। ग्लोब वास्तविक गोलाकार आकृति तथा स्थल-जल के सही सापेक्षिक अनुपात — दोनों दर्शाता है; यह सबसे सटीक प्रतिनिधित्व है। परंतु इसे जेब में रखा नहीं जा सकता तथा एक बार में पूरी पृथ्वी नहीं दिखती। इसीलिए ग्लोब के साथ मानचित्र का प्रयोग होता है, जो वक्र सतह को कागज पर समतल करता है। प्रत्येक समतल मानचित्र आकार, क्षेत्रफल, दूरी अथवा दिशा में से किसी एक में विकृति लाता है; ग्लोब में कोई विकृति नहीं। CTET यहाँ दो तथ्य बार-बार पूछता है — पृथ्वी लध्वक्ष गोलाभ है (पूर्ण गोल नहीं) तथा ग्लोब सर्वाधिक सटीक प्रतिरूप है। शिक्षक को प्रथम पाठ में ग्लोब के साथ संतरा या गेंद रखकर अमूर्त को मूर्त रूप देना चाहिए।
अक्षांश एवं देशांतर
पृथ्वी की सतह पर किसी स्थान की स्थिति बताने हेतु ग्लोब पर एक काल्पनिक ग्रिड बनाया जाता है। क्षैतिज रेखाएँ अक्षांश रेखाएँ कहलाती हैं; उर्ध्वाधर रेखाएँ देशांतर रेखाएँ हैं।
सबसे महत्वपूर्ण अक्षांश है भूमध्य रेखा (विषुवत रेखा) — एक बड़ी रेखा जो पृथ्वी को उत्तरी एवं दक्षिणी गोलार्ध में बाँटती है तथा 0° पर अंकित है। भूमध्य रेखा से अक्षांश 90° उत्तर (उत्तरी ध्रुव) तक एवं 90° दक्षिण (दक्षिणी ध्रुव) तक मापे जाते हैं। चार और अक्षांश विशेष नामों से जाने जाते हैं — कर्क रेखा (23½° उ.), मकर रेखा (23½° द.), आर्कटिक वृत्त (66½° उ.) तथा अंटार्कटिक वृत्त (66½° द.)। दोनों कटिबंधों के बीच का क्षेत्र — जहाँ सूर्य की किरणें वर्ष में कम-से-कम एक बार लंबवत् पड़ती हैं — उष्ण कटिबंध कहलाता है। कटिबंध एवं ध्रुवीय वृत्त के बीच शीतोष्ण कटिबंध हैं, तथा ध्रुवीय वृत्तों से परे शीत कटिबंध।
देशांतर रेखाएँ ध्रुव से ध्रुव तक जाती हैं। प्रधान देशांतर (0°) लंदन के निकट ग्रीनविच से होकर गुजरता है तथा पृथ्वी को पूर्वी एवं पश्चिमी गोलार्ध में बाँटता है। 0° से 180° पूर्व एवं 180° पश्चिम तक गिनती की जाती है; ये दोनों ग्लोब के विपरीत भाग पर मिलते हैं — यही अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा है। तिथि रेखा को पश्चिम से पूर्व पार करने पर एक दिन घट जाता है तथा पूर्व से पश्चिम पार करने पर एक दिन बढ़ जाता है।
देशांतर के प्रत्येक डिग्री से 4 मिनट का समय अंतर होता है (पृथ्वी 24 घंटे में 360° घूमती है, अर्थात् 15° प्रति घंटा)। भारत का मानक देशांतर 82½° पूर्व है जो उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर से गुजरता है; भारतीय मानक समय (IST) ग्रीनविच मानक समय (GMT) से 5 घंटे 30 मिनट आगे है। शिक्षक को दिल्ली (~28° उ., 77° पू.), मुंबई (~19° उ., 73° पू.), कोलकाता (~22° उ., 88° पू.) जैसा एक सरल अभ्यास देना चाहिए जिससे अक्षांश-देशांतर पढ़ना स्वाभाविक कौशल बने।
पृथ्वी की गतियाँ — परिक्रमण एवं परिभ्रमण
पृथ्वी की दो मुख्य गतियाँ हैं। परिभ्रमण (घूर्णन) पृथ्वी का अपनी अक्ष पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूमना है। एक पूर्ण परिभ्रमण 24 घंटे (एक दिन) में पूरा होता है। अक्ष उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव से होकर जाने वाली एक काल्पनिक रेखा है तथा कक्षीय तल के अभिलंब से 23½° झुकी हुई है। यही झुकाव — न कि स्वयं परिभ्रमण — ऋतुओं का कारण है।
परिक्रमण पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर थोड़ी दीर्घवृत्ताकार कक्षा में घूमना है। एक परिक्रमण 365 दिन और लगभग 6 घंटे में पूरा होता है — सामान्यतः 365 दिन गिने जाते हैं। बचे हुए छह घंटे चार वर्षों में 24 घंटे (एक पूरा दिन) बन जाते हैं, जो लीप वर्ष में फरवरी में जोड़ दिया जाता है जिससे फरवरी 29 दिन की होती है। लीप वर्ष में कुल 366 दिन होते हैं। 2024 लीप वर्ष था; अगला लीप वर्ष 2028 होगा।
पृथ्वी जिस तल में परिक्रमण करती है उसे कक्षीय तल कहते हैं। अक्ष की झुकाव-दिशा वर्ष भर एक ही तारे (ध्रुव तारा) की ओर रहती है, इसलिए वर्ष के विभिन्न समय में पृथ्वी के विभिन्न भाग सूर्य की ओर झुके होते हैं। लगभग 21 जून को उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर सर्वाधिक झुका होता है — यह ग्रीष्म अयनांत है। लगभग 22 दिसंबर को दक्षिणी गोलार्ध सूर्य की ओर झुका होता है — उत्तरी गोलार्ध के लिए यह शीत अयनांत। 21 मार्च एवं 23 सितंबर को सूर्य ठीक भूमध्य रेखा पर लंबवत् होता है; पृथ्वी पर सर्वत्र दिन-रात बराबर — ये विषुव (बसंत एवं शरद) हैं।
परिभ्रमण, परिक्रमण एवं अक्षीय झुकाव से चार घटनाएँ उत्पन्न होती हैं जो प्रत्येक CTET अभ्यर्थी को क्रम से बतानी आनी चाहिए — (1) दिन-रात, (2) वर्ष भर दिन की लंबाई में परिवर्तन, (3) चार ऋतुएँ, तथा (4) लीप वर्ष का अस्तित्व।
दिन-रात एवं ऋतुएँ
सूर्य पृथ्वी को प्रकाशित करता है, परंतु किसी भी क्षण उसका केवल आधा भाग सूर्य के सामने होता है। पृथ्वी पश्चिम से पूर्व घूम रही है, इसलिए सूर्य की ओर का आधा भाग बदलता रहता है। सूर्य के सामने वाला भाग दिन तथा विपरीत भाग रात अनुभव करता है। प्रकाशित एवं अप्रकाशित भागों को अलग करने वाली काल्पनिक रेखा प्रकाश वृत्त कहलाती है। यदि पृथ्वी न घूमती तो एक आधा भाग सदा दिन और दूसरा सदा रात रहता — जीवन असंभव होता।
दिन-रात की लंबाई सर्वत्र समान नहीं। भूमध्य रेखा पर सदा 12-12 घंटे का दिन-रात होता है। भूमध्य रेखा से दूर जाने पर अंतर बढ़ता जाता है। आर्कटिक एवं अंटार्कटिक वृत्त के पार ग्रीष्म में निरंतर सूर्यप्रकाश तथा शीत में निरंतर अंधकार रहता है — यही मध्यरात्रि का सूर्य तथा ध्रुवीय रात्रि है।
ऋतुएँ पृथ्वी की अक्षीय झुकाव एवं परिक्रमण से उत्पन्न होती हैं, सूर्य से दूरी में होने वाले छोटे परिवर्तन से नहीं। जब उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर झुका होता है (जून के आसपास), तब वहाँ सूर्य की किरणें खड़े कोण से पड़ती हैं, दिन लंबे होते हैं — यही ग्रीष्म है। उसी समय विपरीत गोलार्ध में शीत होता है। दिसंबर में स्थिति उलट जाती है। विषुव के आसपास सूर्य भूमध्य रेखा पर लंबवत् होता है, दिन-रात लगभग बराबर रहते हैं — यही संक्रमण की बसंत एवं शरद ऋतुएँ हैं।
भारत मुख्यतः भूमध्य रेखा एवं कर्क रेखा के बीच पड़ता है, अतः इसकी अपनी विशिष्ट ऋतु-चक्र है — ग्रीष्म (मार्च–मई), दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून–सितंबर), लौटता मानसून (अक्टूबर–नवंबर) तथा शीत (दिसंबर–फरवरी)। एक प्रचलित भ्रांति, जो CTET में अक्सर पूछी जाती है — 'ग्रीष्म इसलिए होती है क्योंकि पृथ्वी सूर्य के अधिक निकट होती है'। शिक्षक को यह दिखाकर इसे चुनौती देनी चाहिए कि जब उत्तरी गोलार्ध में ग्रीष्म है, तब दक्षिणी गोलार्ध में शीत है — जबकि दोनों सूर्य से समान दूरी पर हैं। कारण है अक्ष का झुकाव, न कि दीर्घवृत्ताकार कक्षा।
ग्लोब बनाम मानचित्र
ग्लोब पृथ्वी का सच्चा त्रि-आयामी प्रतिरूप है। यह सही आकृति (लध्वक्ष गोलाभ), महाद्वीपों एवं महासागरों के सही सापेक्ष क्षेत्रफल, तथा सही दिशा एवं दूरी — सभी दिखाता है। ग्लोब ही ऐसा प्रतिनिधित्व है जो पृथ्वी में कोई विकृति नहीं लाता। किंतु यह भारी होता है, एक बार में केवल आधा भाग दिखाई देता है, तथा छोटे विवरणों को बड़ा नहीं दिखाया जा सकता।
मानचित्र पृथ्वी का — या उसके किसी भाग का — एक निश्चित मापनी पर समतल सतह पर बनाया गया चित्रण है। मानचित्र को जेब में रखा जा सकता है, मेज पर खोला जा सकता है, तथा किसी भी मापनी पर बनाया जा सकता है — किसी शहर की एक गली, एक जिला, भारत, या पूरा विश्व। परंतु वक्र सतह को समतल करने की कीमत विकृति है — प्रत्येक समतल मानचित्र आकार, क्षेत्रफल, दूरी अथवा दिशा में से किसी एक में विकृति अवश्य लाता है।
हर अच्छे मानचित्र पर तीन अनिवार्य तत्व होते हैं — शीर्षक (मानचित्र क्या दिखाता है), दिशा (उत्तर-तीर; सम्मेलनानुसार उत्तर ऊपर की ओर), मापनी (मानचित्र की दूरी एवं उसके अनुरूप वास्तविक दूरी का अनुपात) तथा संकेत-सूची (प्रयुक्त चिह्नों की व्याख्या)। पर्वत, पठार, मैदान, नदी जैसी प्राकृतिक विशेषताएँ दर्शाने वाले मानचित्र भौतिक मानचित्र हैं। देश, राज्य, शहर एवं उनकी सीमाएँ दिखाने वाले राजनीतिक मानचित्र हैं। विशिष्ट जानकारी — वर्षा, सड़कें, मृदा, जनसंख्या, उद्योग — देने वाले विषयक (thematic) मानचित्र हैं।
कक्षा-अभ्यास में विद्यार्थियों को NEWS नियम — उत्तर ऊपर, पूर्व दाहिने, दक्षिण नीचे, पश्चिम बाएँ — से मानचित्र पढ़ना, संकेत-सूची से चिह्न पहचानना, तथा मापनी से दूरी मापना सिखाना चाहिए। CTET-स्तर पर ग्लोब बनाम मानचित्र का प्रश्न अक्सर आता है; उत्तर है — ग्लोब सर्वाधिक सटीक किंतु कम सुवाह्य है, मानचित्र सुवाह्य एवं अनुकूलनीय है किंतु सदैव विकृति लाता है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।
पृथ्वी के चार मंडल
पृथ्वी के पर्यावरण को परंपरागत रूप से चार मंडलों में बाँटा जाता है — स्थलमंडल (ठोस भू-भाग), जलमंडल (सम्पूर्ण जल), वायुमंडल (वायु) एवं जैवमंडल (वह क्षेत्र जहाँ जीवन है)।
स्थलमंडल पृथ्वी का ठोस भू-पटल है — महाद्वीप, पर्वत, पठार, मैदान तथा सागर-तल। यह मृदा, खनिज, जीवाश्म ईंधन तथा निर्माण-सामग्री का स्रोत है। स्थलमंडल के भीतर की भू-गर्भिक हलचलें भूकंप, ज्वालामुखी एवं महाद्वीपों के मंद विस्थापन को जन्म देती हैं।
जलमंडल पृथ्वी की सतह के लगभग 71% भाग को ढके हुए है। इस सम्पूर्ण जल में लगभग 97% महासागरों एवं समुद्रों का खारा जल है; केवल लगभग 3% मीठा जल है, जिसका अधिकांश हिमनदों एवं ध्रुवीय बर्फ की चोटियों में जमा हुआ है। पृथ्वी के कुल जल का 1% से भी कम तरल मीठे जल (नदी, झील, भूजल) के रूप में सुलभ है — जल-संरक्षण के पाठ का यह केंद्रबिंदु तथ्य है।
वायुमंडल पृथ्वी के गुरुत्व द्वारा थामी गई गैसों की पतली परत है। इसमें लगभग 78% नाइट्रोजन, 21% ऑक्सीजन, तथा 1% में आर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड, जलवाष्प एवं अन्य गैसें हैं। वायुमंडल पराबैंगनी विकिरण से रक्षा करता है (समतापमंडल की ओज़ोन परत द्वारा), उचित ऊष्मा को रोककर पृथ्वी को गरम रखता है (हरितगृह प्रभाव), तथा हमें श्वसन हेतु ऑक्सीजन देता है।
जैवमंडल भूमि, जल एवं वायु के संपर्क का संकीर्ण क्षेत्र है जहाँ पादप, पशु, सूक्ष्मजीव एवं मनुष्य — सम्पूर्ण जीवन — विद्यमान है। यह वह क्षेत्र है जहाँ शेष तीनों मंडल मिलकर जीवन को संभव बनाते हैं। चारों मंडल पृथक डिब्बे नहीं हैं; वे लगातार पदार्थ एवं ऊर्जा का आदान-प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए, जल चक्र जल को जलमंडल से वायुमंडल, फिर स्थलमंडल और पुनः जलमंडल में ले जाता है। चार मंडलों की समझ बालकों को आगे के अध्यायों — मृदा, जल, वायु, वनस्पति एवं वन्य जीव — का सूत्र देती है।
भूगोल शिक्षण — ग्लोब एवं मानचित्र
भूगोल को सबसे अच्छा मूर्त से अमूर्त क्रम में पढ़ाया जाता है। NCF 2005 का सुझाव है कि शिक्षण विद्यार्थी के अपने पड़ोस से आरंभ हो और क्रमशः जिले, राज्य, देश एवं विश्व तक विस्तृत हो। 'निकट से दूर' एवं 'ज्ञात से अज्ञात' का सिद्धांत यहाँ सीधे लागू होता है — विद्यार्थी विश्व-मानचित्र पढ़ने से पहले अपनी कक्षा का, फिर अपने विद्यालय का, फिर अपनी बस्ती का स्केच बनाए।
ग्लोब प्रत्येक उच्च प्राथमिक कक्षा में भौतिक रूप से उपस्थित होना चाहिए। डोरी से भूमध्य रेखा खोजना, अपने शहर पर स्टिकर चिपकाना, अंधेरे कमरे में टॉर्च एवं ग्लोब से परिभ्रमण की नकल (एक भाग प्रकाशित, दूसरा अंधकार), तथा अक्ष झुकाकर ऋतुओं का प्रदर्शन — ये अमूर्त संकल्पनाओं को दृश्यमान बना देती हैं। टॉर्च-ग्लोब प्रदर्शन ही वह सर्वाधिक प्रभावी विधि है जिससे यह भ्रांति टूटती है कि ऋतुएँ सूर्य से दूरी पर निर्भर हैं।
मानचित्र को चार अनिवार्य तत्वों — शीर्षक, दिशा (उत्तर-तीर), मापनी एवं संकेत-सूची — के माध्यम से परिचित कराना चाहिए। आरंभ कक्षा के 'मापनी रहित' स्केच मानचित्र से करें, फिर खेत में नापकर मापनी का अर्थ समझाएँ। भौतिक, राजनीतिक एवं विषयक मानचित्रों की तुलना साथ-साथ करें। विद्यार्थियों को स्वयं विषयक मानचित्र बनाने को प्रेरित करें (आँकड़ा-सूची से रंगा भारत का वर्षा-मानचित्र, अपने गाँव का सड़क-मानचित्र) — इससे मानचित्र-साक्षरता पठन की तुलना में कहीं तेज़ बनती है।
स्थानीय क्षेत्र-भ्रमण, हाथ से बने प्रस्तर-काट चित्र, बालू-थाली में नदी-पर्वत के मॉडल, भुवन या गूगल अर्थ के उपग्रह चित्र, तथा मौसम-अवलोकन डायरी पाठ्यपुस्तकीय भूगोल को जीवित अनुभव से जोड़ते हैं। भूगोल का मूल्यांकन केवल राजधानियों को रटने से आगे जाना चाहिए; उसे मानचित्र-पठन, दिशा-ज्ञान, प्रस्तर-काट चित्रण एवं चित्र-तालिका-व्याख्या जाँचनी चाहिए। इस अध्याय के CTET शिक्षण-पद्धति प्रश्न प्रायः उसी विकल्प को सही बताते हैं जो रटने के स्थान पर अवलोकन, क्रिया एवं क्षेत्र-अनुभव पर बल देता है।
अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित में से कौन-सी नदियाँ 'सुंदरबन डेल्टा' का निर्माण करती हैं?
व्याख्या: सुंदरबन विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा है, जो गंगा (हुगली शाखा के साथ) एवं ब्रह्मपुत्र (बांग्लादेश में मेघना के रूप में मिलती) के संयुक्त अवसाद से बंगाल की खाड़ी पर बनता है। यह UNESCO विश्व धरोहर स्थल है तथा रॉयल बंगाल टाइगर एवं मैंग्रोव वनों के लिए प्रसिद्ध है।
स्रोत: CTET Jan 2021 P2, Q32
Q2. उचित विकल्पों के साथ निम्नलिखित का मिलान कीजिए: a. शंकुधारी वन - i. महाद्वीपों के पूर्वी किनारा b. भूमध्यसागरीय वनस्पति - ii. दृढ़ काष्ठ वाले वृक्ष c. उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन - iii. नर्म काष्ठ वाले सदाबहार वृक्ष d. शीतोष्ण सदाबहार वन - iv. महाद्वीपों के पश्चिमी और दक्षिणी-पश्चिमी किनारा
व्याख्या: शंकुधारी (टैगा) वनों में पाइन-फर जैसे नर्म काष्ठ के सदाबहार वृक्ष होते हैं। भूमध्यसागरीय वनस्पति महाद्वीपों के पश्चिमी/दक्षिणी-पश्चिमी किनारों पर (कैलिफोर्निया, मध्य चिली) पाई जाती है। उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों में महोगनी जैसे दृढ़ काष्ठ के वृक्ष हैं। शीतोष्ण सदाबहार वन महाद्वीपों के पूर्वी किनारों पर हैं — अतः सही मिलान a-iii, b-iv, c-ii, d-i।
स्रोत: CTET Jan 2021 P2, Q35
Q3. दिए गए दोनों कथनों पर ध्यान दें और उचित विकल्प का चयन करें: कथन (A): सहारा रेगिस्तान एक समय में पूर्णतया हरा-भरा मैदान था। कथन (B): सहारा की गुफाओं से प्राप्त चित्र नदियों, मगर, हाथी, शेर, पशु तथा बकरियाँ दर्शाते हैं।
व्याख्या: दोनों कथन सत्य हैं। लगभग 8,000–6,000 वर्ष पूर्व सहारा क्षेत्र में आर्द्र जलवायु, घास के मैदान, नदियाँ एवं झीलें थीं। तस्सिली न'अज्जर तथा अन्य गुफा-चित्रों में मगर, दरियाई घोड़े, हाथी, शेर, पशु एवं बकरियाँ दर्शाई गई हैं — इससे प्रमाण मिलता है कि सहारा कभी हरा-भरा मैदान था जहाँ पशुपालक रहते थे।
स्रोत: CTET Jan 2021 P2, Q36
Q4. डॉल्फिन के बारे में दिए गए A, B और C कथनों पर विचार कीजिए, और सही विकल्प का चयन कीजिए: A. गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी के अलवण जल में डॉल्फिन पाई जाती है। B. डॉल्फिन अभयारण्य बिहार राज्य में अवस्थित है। C. डॉल्फिन की उपस्थिति से जल की शुद्धता का पता चलता है।
व्याख्या: A और B सही हैं — गांगेय डॉल्फिन गंगा एवं ब्रह्मपुत्र में मिलती है, तथा विक्रमशिला गांगेय डॉल्फिन अभयारण्य भागलपुर, बिहार में है। कथन C ही फँसाने वाला है — डॉल्फिन की उपस्थिति नदी की पारिस्थितिकीय स्वास्थ्य का संकेतक है, न कि रासायनिक 'शुद्धता' का; CTET 2021 की आधिकारिक उत्तर-कुंजी ने C को असत्य माना।
स्रोत: CTET Jan 2021 P2, Q37
Q5. दिए गए लक्षणों A और B के आधार पर महाद्वीप की पहचान करें: A. यह विश्व का सबसे छोटा महाद्वीप है जो पूरी तरह से दक्षिणी गोलार्द्ध में स्थित है। B. इसे 'द्वीपीय महाद्वीप' भी कहा जाता है।
व्याख्या: यद्यपि 'द्वीपीय महाद्वीप' का प्रचलित नाम ऑस्ट्रेलिया है, फिर भी CTET 2021 की आधिकारिक उत्तर-कुंजी में अंटार्कटिका को सही माना गया है। ऑस्ट्रेलिया भी पूरी तरह दक्षिणी गोलार्ध में है तथा सबसे छोटा महाद्वीप है, अतः दोनों उत्तर बचाव-योग्य हैं; अभ्यर्थी को आधिकारिक कुंजी का पालन करना चाहिए।
स्रोत: CTET Jan 2021 P2, Q58