सामाजिक अध्ययन · CTET नोट्स

मुग़ल साम्राज्य — निर्माण एवं सामाजिक परिवर्तन | CTET SST P2

मुग़ल साम्राज्य (1526–1857) भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे विस्तृत एवं सांगठनिक दृष्टि से सुदृढ़ साम्राज्य था। बाबर के पानीपत-विजय (1526) से आरंभ होकर अकबर के काल में यह उपमहाद्वीप के अधिकांश भाग पर फैल गया, और लगभग दो शताब्दियों तक केंद्रीय शासन, मनसबदारी प्रशासन, संस्कृति-सम्मिश्रण एवं स्थापत्य की एक अनूठी विरासत स्थापित करता रहा। CTET पेपर 2 के सामाजिक अध्ययन में मुग़ल काल से प्रायः 2–3 प्रश्न आते हैं — विशेष रूप से अकबर की धार्मिक नीति (सुल्ह-ए-कुल), मनसबदारी प्रणाली, प्रशासनिक पद (बख्शी, सद्र, कोतवाल, इक़्तादार), तथा साम्राज्य के पतन के कारणों पर। यह पाठ NCERT कक्षा 7 ‘हमारे अतीत — II’ एवं NIOS 509 खंड 2 इकाई 3 पर आधारित है, और प्रत्येक खंड के अंत में पाँच विगत-वर्षीय CTET प्रश्न दिए गए हैं।

MUGHAL EMPIRE

मुग़ल साम्राज्य की स्थापना — बाबर एवं हुमायूँ

मुग़ल वंश के संस्थापक ज़हीरुद्दीन मुहम्मद बाबर (1483–1530) फ़रग़ना (मध्य एशिया) के तैमूरी शासक थे। पिता की ओर से वे तैमूर के वंशज थे और माता की ओर से चंगेज़ ख़ान के। बाबर ने 1526 ई० में पानीपत के प्रथम युद्ध में दिल्ली के अंतिम लोदी सुलतान इब्राहीम लोदी को पराजित किया। यहाँ बाबर ने तोपख़ाने एवं तुलूग़मा युद्ध-नीति का प्रयोग किया, जो भारतीय युद्ध-कला के लिए नया था। इसके पश्चात् 1527 में खानवा के युद्ध में राणा साँगा को और 1529 में घाघरा के युद्ध में अफ़ग़ानों को परास्त किया।

बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘बाबरनामा’ (तुर्की भाषा) लिखी, जो उस काल का अमूल्य ऐतिहासिक स्रोत है। उनके पुत्र हुमायूँ (1530–40, 1555–56) ने पिता का साम्राज्य संभाला परन्तु शेरशाह सूरी के सामने 1539 (चौसा) एवं 1540 (कन्नौज/बिलग्राम) के युद्धों में हार कर ईरान भाग गए। 15 वर्षों के बाद, सूरी वंश के पतन के पश्चात्, हुमायूँ ने 1555 में दिल्ली पुनः प्राप्त की, किंतु अगले ही वर्ष दिल्ली के दीन-पनाह पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरकर उनकी मृत्यु हो गई।

CTET-स्मरण: पानीपत-I (1526) → बाबर बनाम लोदी। पानीपत-II (1556) → अकबर का संरक्षक बैरम ख़ान बनाम हेमू। पानीपत-III (1761) → अहमद शाह अब्दाली बनाम मराठा।

अकबर — विजय एवं सशक्त केंद्रीय शासन

जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (शासनकाल 1556–1605) मुग़ल साम्राज्य का वास्तविक निर्माता माना जाता है। मात्र 13 वर्ष की आयु में राजगद्दी संभालने के बाद, बैरम ख़ान के संरक्षण में उन्होंने पानीपत के द्वितीय युद्ध (1556) में हेमू को पराजित किया। 1562 में स्वयं शासन-संचालन आरंभ करते ही उन्होंने व्यापक विजय-अभियान आरंभ किए — मालवा (1562), गोंडवाना (रानी दुर्गावती, 1564), चित्तौड़ (1568), रणथंभौर (1569), गुजरात (1572–73), बंगाल (1576), काबुल (1581), कश्मीर (1586), सिंध (1591) एवं अहमदनगर के अंशतः अधिग्रहण तक।

अकबर ने सैनिक विजय को कूटनीति से जोड़ा। राजपूतों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किए — आम्बेर के राजा भारमल की पुत्री से विवाह, मानसिंह को साम्राज्य का सेनापति बनाना, राजा टोडरमल को राजस्व-मंत्री नियुक्त करना। यह नीति मुग़ल-शासन को बहुसांप्रदायिक सत्ता-समीकरण में बदल देती है।

अकबर ने राजधानी आगरा से फ़तेहपुर-सीकरी (1571) स्थानांतरित की और शेख़ सलीम चिश्ती के आशीर्वाद-स्थल पर नगर बसाया, जहाँ बुलंद-दरवाज़ा एवं इबादतख़ाना का निर्माण हुआ। बाद में जल-संकट के कारण राजधानी पुनः लाहौर/आगरा लौटी।

मूल्यांकन-संकेत: अकबर के दरबार के नौ-रत्न — अबुल फ़ज़ल, फैज़ी, बीरबल, मानसिंह, टोडरमल, मुल्ला दो-पियाज़ा, तानसेन, हकीम हुमाम, अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना।

अकबर की धार्मिक नीति — सुल्ह-ए-कुल एवं दीन-ए-इलाही

अकबर की सबसे विशिष्ट देन उनकी ‘सुल्ह-ए-कुल’ (सर्वधर्म-शांति) की नीति है। NCERT ‘हमारे अतीत — II’ के अनुसार, अकबर ने यह विचार अपने आरंभिक वर्षों के विभिन्न धर्मगुरुओं के साथ संवाद से विकसित किया। उन्होंने इबादतख़ाना (1575) में हिन्दू, मुस्लिम, जैन, पारसी, सिख एवं ईसाई विद्वानों को आमंत्रित कर खुली धार्मिक चर्चाएँ करवाईं। उनके दरबार में जेसुइट पादरी अकवाविवा, मोंसर्रात भी आए।

1579 में अकबर ने ‘महज़र’ नामक घोषणा-पत्र जारी किया जिसके अनुसार धार्मिक मामलों में अंतिम निर्णय का अधिकार सम्राट को था (केवल जब उलेमा वर्ग मतभेद में हो)। 1582 में उन्होंने ‘दीन-ए-इलाही’ नामक आध्यात्मिक मार्ग प्रारंभ किया — जो कोई औपचारिक धर्म नहीं, बल्कि सत्य-अहिंसा-तत्व पर आधारित एक नैतिक संहिता थी। इसके अनुयायी सीमित ही रहे (बीरबल आदि कुछ ही व्यक्ति)।

व्यावहारिक स्तर पर अकबर ने जज़िया-कर (1564) एवं तीर्थ-यात्रा कर (1563) समाप्त किए, गाय-वध पर रोक लगाई, हिन्दू उच्च-पदाधिकारियों की नियुक्ति की। आधुनिक इतिहासकार इरफ़ान हबीब का कहना है कि अकबर की नीति एक ‘समावेशी राज्य-दर्शन’ थी, जिसका मार्गदर्शन उसके दरबारी अबुल फ़ज़ल के ‘आइन-ए-अकबरी’ में मिलता है। (NIOS 509 खंड 2 इकाई 3)

मनसबदारी एवं जागीरदारी व्यवस्था

अकबर द्वारा 1571 ई० के बाद विकसित मनसबदारी प्रणाली मुग़ल प्रशासन की रीढ़ थी। प्रत्येक अधिकारी को एक संख्यात्मक पद (‘मनसब’) दिया जाता था, जो उसका सैन्य-दर्जा तय करता था। मनसब के दो भाग होते थे:

  • ज़ात: अधिकारी का व्यक्तिगत वेतन-दर्जा एवं सम्मान।
  • सवार: कितने घोड़े-सहित सैनिक उसे रखने थे।

उच्चतम मनसब 10,000 तक थे (मुख्यतः शाहज़ादों के लिए); सामान्य उमरा 1,000–7,000 ज़ात के होते थे। मनसबदार अपने वेतन को नकद या जागीर (राजस्व-अधिकार) के रूप में प्राप्त करते थे।

जागीरदारी प्रणाली के अंतर्गत मनसबदार को कुछ निश्चित क्षेत्र (जागीर) सौंपा जाता था, जहाँ से वह राजस्व वसूल कर अपना वेतन निकालता था। शेष राशि साम्राज्य के कोष में जमा होती थी। जागीर हस्तांतरणीय थी — सामान्यतः 3 वर्ष में मनसबदार का स्थानांतरण होता था ताकि वह क्षेत्र-विशेष से जुड़ न जाए।

केंद्रीय पदाधिकारी:
वज़ीर / दीवान-ए-आला — वित्त एवं राजस्व का मुख्य मंत्री।
मीर बख्शी — सैन्य-वेतन एवं भर्ती-अधिकारी, मनसबदारों की सूची-धारक।
सद्र-उस-सुदूर — धार्मिक एवं धर्मार्थ दान का मंत्री।
क़ाज़ी-उल-क़ुज़ात — मुख्य न्यायाधीश।
कोतवाल — नगर-प्रशासक एवं पुलिस-अधिकारी।
इक़्तादार — क्षेत्रीय सैन्य कमांडर एवं राजस्व-वसूलनेकर्ता।

शाहजहाँ एवं मुग़ल स्थापत्य का स्वर्ण-युग

जहाँगीर (1605–27) के काल को चित्रकला का स्वर्ण-युग कहा जाता है, परंतु स्थापत्य का स्वर्ण-काल शाहजहाँ (1628–58) के समय आता है। उन्होंने आगरा में ताजमहल (1632–53) का निर्माण अपनी पत्नी मुमताज़ महल की स्मृति में करवाया — श्वेत-संगमरमर, पीत्रादुरा (बहुरंगी-पच्चीकारी), चार-बाग़ शैली और निखालिस इस्लामी-भारतीय समन्वय की चरमश्रेणी।

शाहजहाँ ने राजधानी आगरा से शाहजहाँनाबाद (दिल्ली) स्थानांतरित की और वहाँ लाल क़िला (1638–48), जामा मस्जिद (1644–56) एवं चांदनी-चौक का निर्माण करवाया। लाल क़िले के अंदर ‘दीवान-ए-आम’ एवं ‘दीवान-ए-ख़ास’ — जहाँ प्रसिद्ध ‘तख़्त-ए-ताऊस (मयूर सिंहासन)’ रखा गया था।

मुग़ल चित्रकला ने इस काल में ईरानी सुघड़ता को भारतीय रंग-संगति से जोड़ा। प्रसिद्ध चित्रकार उस्ताद मंसूर, अबुल हसन, बिशनदास उल्लेखनीय हैं। मुग़ल-शैली से राजस्थानी, पहाड़ी, दक्कनी चित्रकला उपशैलियाँ विकसित हुईं।

शाहजहाँ की पुत्री जहाँआरा-बेगम तथा बेटे दारा-शिकोह दोनों विद्वान थे; दारा ने ‘मज्म-उल-बहरीन’ (दो समुद्रों का संगम) ग्रंथ लिखकर इस्लाम एवं वेदांत के मध्य संवाद स्थापित किया एवं उपनिषदों का फ़ारसी अनुवाद ‘सिर्र-ए-अकबर’ करवाया।

औरंगज़ेब एवं साम्राज्य के पतन के कारण

औरंगज़ेब (1658–1707) ने अपने भाइयों दारा, शुजा, मुराद को परास्त एवं हत्या कर सत्ता पाई और पिता शाहजहाँ को आगरा-क़िले में बंदी बना दिया। उनके 49 वर्षीय शासन में मुग़ल साम्राज्य अपने भौगोलिक चरम पर पहुँचा — दक्षिण भारत तक विस्तार — किंतु यही विस्तार उसके पतन का कारण भी बना।

पतन के प्रमुख कारण (NCERT ‘हमारे अतीत — II/III’ एवं NIOS 509 खंड 2):

  1. दक्कन में 25-वर्षीय युद्ध: मराठा शिवाजी एवं उनके उत्तराधिकारियों के विरुद्ध दीर्घ अभियान — कोष-व्यय एवं सेना का क्षरण।
  2. धार्मिक नीति में परिवर्तन: 1679 में जज़िया-कर पुनः लागू; काशी-विश्वनाथ एवं मथुरा के मंदिर तोड़े जाने का उल्लेख; राजपूतों से सम्बन्ध-कटुता।
  3. जागीरदारी संकट: मनसबदारों की संख्या बढ़ी, परंतु जागीरें कम पड़ीं — पाए-बाक़ी (वेतन-बकाया) बढ़ती गई।
  4. क्षेत्रीय विद्रोह: सिख (गुरु तेग़बहादुर का बलिदान 1675, गुरु गोबिंद सिंह के विरुद्ध संघर्ष), जाट (गोकुला), सतनामी, बुंदेला, मराठा एवं अहोम विद्रोह।
  5. नादिर शाह का आक्रमण (1739): दिल्ली पर हमला, मयूर-सिंहासन एवं कोह-ए-नूर हीरा छीना; मुग़ल प्रतिष्ठा धराशायी।
  6. उत्तरवर्ती दुर्बल सम्राट: बहादुर शाह-I, फ़र्रुख़सियर, मुहम्मद शाह ‘रंगीला’, अहमद शाह, आलमगीर-II, शाह आलम-II, अकबर-II, बहादुर शाह ज़फ़र — साम्राज्य धीरे-धीरे क्षेत्रीय शक्तियों (मराठा, सिख, हैदराबाद, अवध, बंगाल) में बँट गया।

1857 ई० के विद्रोह के बाद अंतिम मुग़ल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र को रंगून निर्वासित किया गया, जिसके साथ 300 वर्षीय मुग़ल वंश का औपचारिक अंत हुआ।

मुग़लकालीन समाज, व्यापार एवं अर्थव्यवस्था

मुग़ल काल में भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि-केंद्रित थी। राजा टोडरमल के ‘दहसाला’ बंदोबस्त (1582) ने राजस्व-निर्धारण को व्यवस्थित किया — पिछले दस वर्षों की उपज के औसत का एक-तिहाई राज्य-कर। भूमि का तीन प्रकार से वर्गीकरण: पोलज, परौती, चचर एवं बंजर

व्यापार में सूरत, अहमदाबाद, मस्लीपट्टनम, हुगली, ढाका प्रमुख बंदरगाह एवं केंद्र थे। भारत यूरोप को सूती कपड़ा (कैलिको, मलमल), नील, मसाले, साल्टपीटर निर्यात करता था और सोना/चाँदी आयात करता था। उसी काल में अंग्रेज़, डच, फ़्रांसीसी, पुर्तगाली ईस्ट इंडिया कंपनियाँ स्थापित हुईं।

समाज में जाति-व्यवस्था पूर्ववत् कायम थी। हिन्दू-मुस्लिम जीवन में सूफ़ी एवं भक्ति आंदोलनों का गहरा प्रभाव था — कबीर, रैदास, मीराबाई, गुरु नानक, सूरदास, तुलसीदास इसी काल के संत-कवि हैं। ख़ानक़ाहें एवं दरगाहें — विशेष रूप से ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती (अजमेर) एवं निज़ामुद्दीन औलिया (दिल्ली) — सामाजिक सहिष्णुता के केंद्र थीं।

स्त्रियों की स्थिति: नूरजहाँ (जहाँगीर की पत्नी) ने प्रशासन में सक्रिय भूमिका निभाई; जहाँआरा एवं रोशनआरा स्थापत्य एवं साहित्य की संरक्षक थीं। तथापि सामान्य महिलाओं की स्थिति प्रतिबंधित रही — पर्दा-प्रथा एवं सती-प्रथा बनी रही।

मुग़ल काल पढ़ाने की शिक्षाशास्त्रीय दृष्टि — स्रोत एवं कक्षा-प्रक्रिया

NCF 2005 एवं NIOS 509 खंड 2 इकाई 4 (इतिहास-शिक्षण) के अनुसार, मुग़ल काल जैसे विषयों को केवल कालक्रम-तालिकाओं के रूप में नहीं, बल्कि प्राथमिक स्रोतों एवं विमर्श-आधारित पद्धति से पढ़ाया जाना चाहिए।

प्रमुख प्राथमिक स्रोत जो कक्षा 7–8 में सुलभ हैं:

  • बाबरनामा (बाबर का आत्म-वृत्तांत) — फ़रग़ना के बाग़, फलों, हाथियों के विवरण से बच्चे काल-संदर्भ समझते हैं।
  • आइन-ए-अकबरी (अबुल फ़ज़ल) — मनसब, राजस्व, दरबार के विवरण।
  • अकबरनामा, तुज़ुक-ए-जहाँगीरी, बादशाहनामा — मुग़ल-दृष्टि से लिखित इतिहास।
  • मुग़ल चित्र — कक्षा-गतिविधि के लिए दृश्य-स्रोत।
  • ताजमहल, फ़तेहपुर-सीकरी, लाल-क़िला — स्थापत्य के अध्ययन-स्थल।

कक्षागत गतिविधियाँ (NCERT ‘हमारे अतीत — II’ शिक्षक-संदर्शिका):

  • ‘यदि आप अकबर के दरबार में होते...’ — कल्पनात्मक लेखन।
  • स्थानीय स्थापत्य-तत्वों (मेहराब, गुंबद, चार-बाग़) की भू-निरीक्षण-यात्रा।
  • स्रोत-आधारित प्रश्नोत्तर — आइन-ए-अकबरी के लघु अंश पर समीक्षात्मक चर्चा।
  • तुलनात्मक सारणी — सल्तनत बनाम मुग़ल प्रशासन।
CTET-संकेत: ‘हमारे अतीत’ शृंखला का दर्शन — विद्यार्थी ‘इतिहासकार बनकर’ सोचे, स्रोतों को परखे, बहु-दृष्टिकोण समझे — यही NCF 2005 का ‘रचनात्मक इतिहास-शिक्षण’ है। प्रश्न प्रायः इस उद्देश्य पर केंद्रित होते हैं।

अभ्यास प्रश्न

Q1. कथन (A): अकबर, जहांगीर और शाहजहां ने सुल्ह-ए-कुल (सर्व शांति) के विचार को शासन का सिद्धांत बनाया। कथन (B): विभिन्न धर्मों से जुड़े हुए व्यक्तियों के साथ विचार-विमर्श ने अकबर की समझ बना दी कि जो विद्वान धार्मिक रीति और कट्टरता पर अधिक बल देते हैं वे अक्सर कट्टर होते हैं।

  • (A) सही है, किन्तु (B) गलत है।
  • (A) गलत है, किन्तु (B) सही है।
  • (A) एवं (B) दोनों सही हैं एवं (A) के (B) ने स्पष्टीकरण है।
  • (A) एवं (B) दोनों सही हैं, किन्तु (A) कारण (B) है ।

व्याख्या: अकबर, जहाँगीर एवं शाहजहाँ तीनों ने सुल्ह-ए-कुल को राज्य-सिद्धांत बनाया। अकबर का इबादतख़ाना (1575) में विभिन्न धर्मों के विद्वानों से संवाद ही उन्हें इस निष्कर्ष पर ले गया कि कर्मकांड-कट्टरता पर बल देने वाले विद्वान अधिकांशतः संकीर्ण होते हैं। अतः (B) ही (A) का कारण है। उत्तर: (3)।

स्रोत: CTET Jan 2021 P2, Q51

Q2. कथन (A): दिल्ली के सुल्तानों और मुगलों के काल में क्षेणीबद्ध समाज ज्यादा सरल हो गया। कथन (B): जनजातीय समाज कई असमान वर्गों में विभाजित नहीं था।

  • (A) सही है, (B) गलत है।
  • (A) गलत है, किन्तु (B) सही है।
  • (A) एवं (B) दोनों सही हैं और (B) का सही स्पष्टीकरण (A) है।
  • (A) एवं (B) दोनों सही हैं, किन्तु (A) का सही स्पष्टीकरण (B) नहीं है।

व्याख्या: दिल्ली सुल्तानों एवं मुग़लों के काल में सामाजिक श्रेणी-व्यवस्था सरल नहीं हुई बल्कि अधिक जटिल हुई — दरबारी अमीर, मनसबदार, ज़मींदार, किसान, कारीगर, दास इत्यादि कई स्तर बने। अतः (A) ग़लत है। जनजातीय समाज वस्तुतः वर्गहीन या अल्प-वर्गीय होते थे, अतः (B) सही है। उत्तर: (2)।

स्रोत: CTET Jan 2021 P2, Q52

Q3. मुगल साम्राज्य के पतन के संदर्भ में निम्नलिखित का मिलान कीजिए। (a) फर्रुखसियर (i) 1759 - 1816 (b) शाह आलम द्वितीय (ii) 1713 - 1719 (c) अहमदशाह (iii) 1754 - 1759 (d) आलमगीर द्वितीय (iv) 1748 - 1754

  • (a)-(i), (b)-(iii), (c)-(iv), (d)-(ii)
  • (a)-(iv), (b)-(ii), (c)-(i), (d)-(iii)
  • (a)-(ii), (b)-(i), (c)-(iv), (d)-(iii)
  • (a)-(iii), (b)-(i), (c)-(ii), (d)-(iv)

व्याख्या: उत्तर-काल के मुग़ल सम्राटों के शासनकाल — फ़र्रुख़सियर (1713–19), अहमदशाह (1748–54), आलमगीर-II (1754–59), शाह आलम-II (1759–1806/1816)। अतः सही मिलान: (a)-(ii), (b)-(i), (c)-(iv), (d)-(iii)। उत्तर: (2)।

स्रोत: CTET Dec 2022 P2 (28 Dec), Q32

Q4. कौन सही सुमेलित हैं? (A) बख्शी – सैनिक वेतनाधिकारी (B) सद्र – धार्मिक व धर्मार्थ किए जाने वाले का मंत्री (C) इक्तादार – सैन्य कमांडर (D) कोतवाल – नगर का पुलिस अधिकारी

  • केवल (C) और (D)
  • केवल (A), (B) और (C)
  • केवल (A) और (B)
  • केवल (A), (B) और (D)

व्याख्या: बख्शी (सैन्य-वेतन एवं भर्ती), सद्र (धार्मिक-धर्मार्थ दान का मंत्री), कोतवाल (नगर-पुलिस अधिकारी) — तीनों सही हैं। इक़्तादार दिल्ली सल्तनत का पद था, मुग़ल काल में इसका प्रचलन सीमित था — इसलिए (C) ‘सैन्य कमांडर’ ग़लत मिलान है। अतः सही उत्तर (A), (B) एवं (D) — विकल्प (4)।

स्रोत: CTET Dec 2022 P2 (28 Dec), Q36

Q5. मनसबदारी व्यवस्था में ‘ज़ात’ एवं ‘सवार’ के सन्दर्भ में कौन-सा कथन सही है?

  • ‘ज़ात’ अधिकारी का धार्मिक-दर्जा था, ‘सवार’ उसकी जागीर की कीमत।
  • ‘ज़ात’ अधिकारी का व्यक्तिगत वेतन-दर्जा एवं सम्मान-संख्या था, ‘सवार’ उसके द्वारा रखे जाने वाले घोड़े-सहित सैनिकों की संख्या।
  • ‘ज़ात’ केवल राजपूत अधिकारियों के लिए था, ‘सवार’ केवल मुस्लिम मनसबदारों के लिए।
  • दोनों केवल बादशाह के निकट-संबंधियों को दिए जाते थे।

व्याख्या: अकबर की मनसबदारी व्यवस्था (1571 के बाद) में प्रत्येक मनसबदार के दो दर्जे होते थे — ‘ज़ात’ उसका व्यक्तिगत वेतन-स्तर एवं प्रतिष्ठा-संख्या तय करता था, और ‘सवार’ यह बताता था कि वह कितने घोड़े-सहित सैनिक रखेगा। (आइन-ए-अकबरी; NCERT कक्षा 7 हमारे अतीत II) अतः सही उत्तर (2)।

स्रोत: Practice Question (NCERT कक्षा 7, ‘हमारे अतीत — II’)