विद्रोह के कारण — राजनीतिक एवं आर्थिक
1857 का विद्रोह आकस्मिक प्रतिक्रिया नहीं था; यह दशकों से जमा आक्रोश का विस्फोट था। राजनीतिक कारण मुख्यतः कंपनी की विस्तार-नीतियों से उत्पन्न हुए:
- विलय-सिद्धांत (डॉक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स) — डलहौज़ी, 1848: यदि देशी शासक की पुरुष-संतान न हो तो दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी न मानकर रियासत कंपनी में मिला ली जाती। इसी आधार पर झाँसी (1853), सतारा, नागपुर, सम्बलपुर, उदयपुर पर कब्ज़ा हुआ।
- अवध का विलय (1856): कुप्रशासन के बहाने वाजिद अली शाह को निर्वासित। यह उत्तर भारत के मुसलमानों एवं अवधी सिपाहियों के बीच गहरा आक्रोश पैदा करता है।
- मुग़ल सम्राट का अपमान: कंपनी ने बहादुर शाह ज़फ़र की उपाधि, पेंशन एवं लाल-क़िले में निवास के अधिकार सीमित किए; घोषणा हुई कि उत्तराधिकारी ‘बादशाह’ नहीं ‘केवल शाह’ कहलाएगा।
आर्थिक कारण: स्थायी बंदोबस्त, रैयतवारी एवं महलवारी की कठोर राजस्व-दरें, नील-व्यवस्था, मलमल-व्यापार का पतन, ब्रिटिश आयातित कपड़ों ने भारतीय बुनकरों को बेरोज़गार किया। ज़मींदारों की भूमि नीलाम होती जा रही थी, किसान कर्ज़ में डूब रहे थे।
विद्रोह के कारण — सामाजिक, धार्मिक एवं सैन्य
सामाजिक-धार्मिक कारण: 1813 के चार्टर अधिनियम के बाद ईसाई मिशनरियों को भारत में खुली अनुमति मिली। मिशन-स्कूल, धर्म-परिवर्तन की चर्चाएँ, सती-निषेध (1829), विधवा-पुनर्विवाह कानून (1856), अंग्रेज़ी शिक्षा-प्रोत्साहन — सब को परंपरा-विरोधी हस्तक्षेप माना गया। ‘धार्मिक संकट’ की धारणा बहुत बलवती थी।
1850 का धार्मिक अयोग्यता अधिनियम (Religious Disabilities Act) कहता था कि धर्म-परिवर्तन से उत्तराधिकार का अधिकार नहीं छिनेगा — हिन्दू-मुसलमान दोनों ने इसे अपने धर्म पर आघात माना।
सैन्य कारण: यह विद्रोह की तत्काल चिंगारी थी।
- एनफ़ील्ड राइफ़ल के कारतूस (1856–57): नए कारतूसों पर गाय एवं सूअर की चर्बी की अफ़वाह — हिन्दू एवं मुसलमान दोनों सिपाहियों के लिए धार्मिक अपमान।
- वेतन-असंतोष: भारतीय सिपाही को ब्रिटिश की तुलना में बहुत कम वेतन; पदोन्नति सीमित।
- सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम (1856): सिपाहियों को विदेश-तैनाती को विवश करता था — हिन्दू सिपाही के लिए ‘कालापानी’ धार्मिक अपवित्रता थी।
- अवध-विलय ने अवधी मूल के अधिकांश सिपाहियों के परिवारों को सीधे प्रभावित किया।
29 मार्च 1857 को बैरकपुर छावनी में मंगल पांडे ने कारतूस-काट से इनकार कर एक अंग्रेज़ अधिकारी पर हमला किया — फाँसी 8 अप्रैल को हुई।
विद्रोह का विस्तार — मेरठ से दिल्ली
10 मई 1857 — मेरठ की 3री हल्की घुड़सवार, 11वीं एवं 20वीं देशी पैदल टुकड़ी ने कारतूस लेने से इनकार करने पर बंदी 85 सिपाहियों को मुक्त करवाया, अंग्रेज़ अधिकारियों को मारा, और रात भर में 50 किलोमीटर की यात्रा कर 11 मई की भोर में दिल्ली पहुँचे।
11 मई 1857 — दिल्ली: सिपाहियों ने 82-वर्षीय बहादुर शाह ज़फ़र-II को ‘हिंदुस्तान का शहंशाह’ घोषित किया। यद्यपि वे वस्तुतः राजनीतिक/सैन्य नेतृत्व देने की स्थिति में नहीं थे, उनके नाम-मात्र नेतृत्व ने विद्रोह को एक प्रतीकात्मक केंद्र दिया।
विद्रोह तीव्र गति से फैला:
| केंद्र | नेता | विशेष |
|---|---|---|
| दिल्ली | बहादुर शाह ज़फ़र, मिर्ज़ा मुग़ल, बख़्त ख़ान | 14 सितंबर 1857 को दिल्ली पुनः अंग्रेज़ी कब्ज़े में। |
| कानपुर | नाना साहेब (पेशवा बाजीराव-II के दत्तक पुत्र), तात्या टोपे | जुलाई 1857 में ब्रिटिश परिवारों का सतीचौरा-घाट हत्याकांड। |
| लखनऊ | बेगम हज़रत महल (नवाब वाजिद अली शाह की पत्नी) | रेज़िडेंसी की 87-दिवसीय घेराबंदी। |
| झाँसी | रानी लक्ष्मीबाई | ‘मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी’; जून 1858 में ग्वालियर के पास वीरगति। |
| बरेली | ख़ान बहादुर ख़ान | रुहेलखंड के 7-माह स्वायत्त शासन। |
| बिहार | कुँवर सिंह (जगदीशपुर) | 80 वर्ष की आयु में नेतृत्व; अप्रैल 1858 में निधन। |
| फ़ैज़ाबाद | मौलवी अहमदुल्लाह शाह | ‘रोहिल्ला-धर्म-गुरु’; नेतृत्व का धार्मिक प्रतीक। |
प्रमुख नेता — मंगल पांडे, बहादुर शाह, नाना साहेब
मंगल पांडे (1827–57) — 34वीं देशी पैदल टुकड़ी, बैरकपुर। 29 मार्च 1857 को कारतूस-काट से इनकार; अंग्रेज़ अधिकारी ह्यूसन को घायल किया। 8 अप्रैल 1857 को फाँसी। विद्रोह का प्रथम शहीद माने जाते हैं।
बहादुर शाह ज़फ़र-II (1775–1862) — अंतिम मुग़ल सम्राट, उर्दू-फ़ारसी कवि (‘ज़फ़र’ उनका तख़ल्लुस था)। 11 मई 1857 को नाममात्र नेतृत्व स्वीकार किया; दिल्ली पतन के बाद हुमायूँ के मक़बरे में बंदी; नवंबर 1858 में रंगून निर्वासित। 1862 में निधन।
नाना साहेब (धोंडू पंत, 1824–59) — अंतिम पेशवा बाजीराव-II के दत्तक पुत्र। डलहौज़ी ने उनकी पेंशन रद्द कर दी थी। कानपुर के विद्रोह का नेतृत्व; जून 1857 में स्वतंत्रता घोषित; जुलाई 1857 तक कानपुर खो दिया। बाद में नेपाल भाग गए; उनकी मृत्यु का स्पष्ट प्रमाण नहीं।
तात्या टोपे (रामचंद्र पांडुरंग, 1814–59) — नाना साहेब के सहयोगी, अद्भुत सैन्य रणनीतिज्ञ। कानपुर, ग्वालियर एवं मध्य भारत में लंबी छापामार लड़ाइयाँ; अप्रैल 1859 में पकड़े गए; 18 अप्रैल 1859 को फाँसी।
रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे एवं अन्य
रानी लक्ष्मीबाई (मणिकर्णिका, 1828–58) — झाँसी के राजा गंगाधर राव की पत्नी। 1853 में पति की मृत्यु एवं दत्तक पुत्र दामोदर राव के बावजूद कंपनी ने ‘विलय-सिद्धांत’ से झाँसी हड़प ली। 1857 में रानी ने झाँसी पर नियंत्रण लिया; मार्च 1858 में ह्यूग रोज़ की सेना ने झाँसी पर आक्रमण किया। रानी कालपी, फिर ग्वालियर तक लड़ीं; 18 जून 1858 को ग्वालियर के पास युद्ध-भूमि में वीरगति प्राप्त की। उनकी प्रसिद्ध उक्ति ‘मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी’ इतिहास का अमर वाक्य है।
बेगम हज़रत महल — वाजिद अली शाह की उपपत्नी। लखनऊ के विद्रोह की नेतृत्वकर्ता; अपने नाबालिग पुत्र बिर्जिस क़द्र को नवाब घोषित कर 5 जुलाई 1857 से शासन-संचालन। दिसंबर 1858 में नेपाल भाग गईं; काठमांडू में 1879 तक निर्वासन।
कुँवर सिंह (1777–1858) — बिहार के जगदीशपुर के 80-वर्षीय राजपूत ज़मींदार। बक्सर-आरा क्षेत्र के विद्रोह के नेता; अप्रैल 1858 में जगदीशपुर पुनः जीता पर तीन दिन बाद मृत्यु।
मौलवी अहमदुल्लाह शाह (फ़ैज़ाबाद) — फ़कीर एवं उर्दू-अरबी विद्वान, धार्मिक-राजनीतिक नेता; लखनऊ रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका; जून 1858 में मार दिए गए।
नाना साहेब के सेनापति बाजीराव टोपे, अज़ीमुल्लाह ख़ान (नाना के दूत) आदि भी इस इतिहास के अनिवार्य पात्र हैं।
दमन एवं ब्रिटिश प्रतिक्रिया
विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेज़ों ने हाव्लॉक, आउट्रम, कोलिन कैम्पबेल, ह्यूग रोज़, नील, निकोलसन जैसे अधिकारियों के नेतृत्व में अत्यधिक क्रूर अभियान चलाए।
- 20 सितंबर 1857 — दिल्ली पुनर्ग्रहण; निकोलसन की मृत्यु; मुग़ल राजकुमारों मिर्ज़ा मुग़ल, ख़िज़्र सुलतान को कैप्टन हडसन ने ‘प्रत्यर्पण’ के बहाने गोली मार दी।
- 16 नवंबर 1857 — कानपुर पुनर्ग्रहण; ब्रिटिश सेना ने सतीचौरा-हत्याकांड का बदला अत्यंत निर्मम रूप से लिया।
- 21 मार्च 1858 — लखनऊ की पूर्ण पुनर्जीत।
- 3 जून 1858 — झाँसी की पुनर्जीत; रानी की वीरगति।
विद्रोह दमन में ‘सामूहिक फाँसी’ एवं ‘तोप-मुख से उड़ाना’ (तोप के मुँह पर सिपाही को बाँधकर गोला चलाना) जैसे क्रूर तरीक़े अपनाए गए। पूरे गाँव जला दिए गए, फसलें नष्ट कर दी गईं।
ब्रिटिश गृह-नीति में परिवर्तन — विद्रोह का प्रबंधन ‘कंपनी’ की समस्या न रहकर ‘ब्रिटिश राज्य’ की समस्या बना।
परिणाम — कंपनी शासन का अंत एवं क्राउन-राज
2 अगस्त 1858 को ब्रिटिश संसद ने Government of India Act 1858 पारित किया। इसके मुख्य प्रावधान:
- ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन समाप्त — कंपनी की भारत-संबंधी सत्ता ब्रिटिश ताज (Crown) को हस्तांतरित।
- ‘बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल’ एवं ‘बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स’ की दोहरी व्यवस्था समाप्त; नया ‘भारत के लिए राज्य-सचिव’ (Secretary of State for India) पद बना, जो ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी था।
- 15-सदस्यीय ‘भारत-परिषद्’ (India Council) उनकी सहायता हेतु।
- गवर्नर-जनरल को नई उपाधि ‘वायसरॉय’; लॉर्ड कैनिंग पहले वायसरॉय बने।
रानी विक्टोरिया की घोषणा — 1 नवंबर 1858 (इलाहाबाद से जारी) में नई नीति घोषित:
- विलय-सिद्धांत अब लागू नहीं — रियासतों के दत्तक उत्तराधिकारियों को मान्यता।
- धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं।
- विद्रोह में अप्रत्यक्ष सम्मिलित व्यक्तियों के लिए माफ़ी।
- ‘योग्यता एवं निष्ठा’ के आधार पर सरकारी पदों पर भारतीय भर्ती।
सेना का पुनर्गठन: ‘मार्शल रेस’ सिद्धांत — सिख, गोरखा, राजपूत, जाट, पठान को अधिमान्य भर्ती; उच्च-जातीय हिन्दू एवं अवधी सिपाहियों का अनुपात घटाया गया। यूरोपीय बनाम भारतीय सिपाहियों का अनुपात बढ़ाकर 1:2 किया गया।
1857 का शिक्षण — विविध दृष्टिकोण एवं स्रोत
NCERT कक्षा 8 ‘हमारे अतीत — III’ का अध्याय 5 1857 को कई दृष्टियों से प्रस्तुत करता है — सिपाहियों की, ज़मींदारों की, किसानों की, स्त्रियों की, अंग्रेज़ अधिकारियों की। NCF 2005 कहता है कि किसी ऐतिहासिक घटना के एकल-नायक-केंद्रित पाठ से बच कर बहु-दृष्टि अपनाई जाए।
शिक्षण-स्रोत जो कक्षा 8 में सुलभ हैं:
- विद्रोही ‘इश्तेहार’ (पर्चे) एवं प्रकाशन — अवधी एवं दिल्ली-इलाहाबाद के दस्तावेज़।
- ब्रिटिश अधिकारी हडसन, कैनिंग, ह्यूग रोज़ की डायरियाँ एवं रिपोर्टें।
- अमर चित्र कथा, सत्यजित रे की ‘शतरंज के खिलाड़ी’ (1977), श्याम बेनेगल की ‘जुनून’ (1979), विशाल भारद्वाज की ‘मंगल पांडे’ (2005)।
- ‘1857 — जन-गीत एवं लोक-कथाएँ’ (बुंदेली, अवधी)।
- संग्रहालय — दिल्ली का राष्ट्रीय संग्रहालय, झाँसी क़िला, रेजिडेंसी (लखनऊ) — फ़ील्ड-यात्राएँ।
कक्षागत गतिविधि (NCERT अध्याय 5 अंत): ‘कल्पना कीजिए कि आप 1857 के बारेली में एक 14-वर्षीय बालक/बालिका हैं — एक दिन की डायरी लिखिए।’ यह कल्पनात्मक लेखन इतिहास-शिक्षण को संवेदी अनुभव बनाता है।
अभ्यास प्रश्न
Q1. कथन (A): बहादुर शाह ज़फर ने मुखियाओं और शासकों को हिंदुस्तानी राज्यों के लड़ने के लिए संघ बनाने का आह्वान किया। कथन (B): बहादुर शाह ज़फर के 1857 के बगावत को आशा सम्बंध देने के फैसले ने मिलित संगठित पीड़ित बगावतियों के पक्ष में बदल दी।
व्याख्या: 11 मई 1857 को बहादुर शाह ज़फ़र को नाममात्र नेता घोषित किए जाने के बाद उनके नाम से अनेक राज्यों के मुखियाओं को पत्र भेजे गए, जिनमें ‘हिंदुस्तानी राज्यों के संघ’ का आह्वान था। यह कथन सही है; आगे (B) में जो असम्बद्ध दावा होगा वह सही नहीं — अतः उत्तर: (1) ‘(A) सही, (B) ग़लत’।
स्रोत: CTET Jan 2021 P2, Q53
Q2. 1857 के विद्रोह के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: (I) मई 1857 में भारी विद्रोह का आरंभ हुआ। (II) यह उपनिवेशवाद के विरुद्ध सबसे बड़ा अप्रतिरोधी (पैसिव) आंदोलन था। (III) इसमें सिपाहियों और जन साधारण ने बड़ी संख्या में भाग लिया। कौन सा कथन सही नहीं है/हैं?
व्याख्या: 1857 के विद्रोह के बारे में सही कथनों की पहचान का तरीक़ा — मुख्य तथ्य याद रखें: मेरठ → 10 मई 1857; दिल्ली पतन → 14–20 सितंबर 1857; बहादुर शाह ज़फ़र की रंगून निर्वासन-मृत्यु → 1862; सतीचौरा-घाट कानपुर; रानी की वीरगति → 18 जून 1858 ग्वालियर। NCERT कक्षा 8 अध्याय 5 के अनुसार सही विकल्प चुनें।
स्रोत: CTET Dec 2022 P2 (28 Dec), Q42
Q3. ‘विलय-सिद्धांत’ (Doctrine of Lapse) किसने और कब लागू किया?
व्याख्या: ‘विलय-सिद्धांत’ लॉर्ड डलहौज़ी (1848–56) की नीति थी — पुरुष-संतान न होने पर देशी रियासत कंपनी में मिल जाती। इसी से सतारा (1848), जैतपुर (1849), संबलपुर (1849), उदयपुर (1852), झाँसी (1853), नागपुर (1854) कंपनी में मिलाए गए। NCERT कक्षा 8 अध्याय 1। उत्तर (3)।
स्रोत: Practice Question (NCERT कक्षा 8)
Q4. 1857 के विद्रोह के बाद ‘रानी विक्टोरिया की घोषणा’ (1 नवंबर 1858) में निम्नलिखित में से कौन-सा प्रावधान शामिल नहीं था?
व्याख्या: रानी विक्टोरिया की घोषणा (1 नवंबर 1858, इलाहाबाद) में तीन मुख्य वचन थे — विलय-सिद्धांत समाप्त, धार्मिक हस्तक्षेप न, योग्यता-आधारित भर्ती। ‘विदेश-सेवा से छूट’ का कोई वचन नहीं था — यह ‘सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम 1856’ का विषय था। अतः (4) ‘शामिल नहीं’ — उत्तर (4)।
स्रोत: Practice Question (NCERT कक्षा 8 अध्याय 5)
Q5. 1857 के विद्रोह के निम्नलिखित नेताओं को उनके केंद्रों से मिलाइए: (a) रानी लक्ष्मीबाई — (i) लखनऊ (b) बेगम हज़रत महल — (ii) कानपुर (c) नाना साहेब — (iii) झाँसी (d) कुँवर सिंह — (iv) जगदीशपुर
व्याख्या: रानी लक्ष्मीबाई — झाँसी, बेगम हज़रत महल — लखनऊ, नाना साहेब — कानपुर, कुँवर सिंह — जगदीशपुर (बिहार)। NCERT कक्षा 8 अध्याय 5। अतः (a)-(iii), (b)-(i), (c)-(ii), (d)-(iv) — विकल्प (1)।
स्रोत: Practice Question (NCERT कक्षा 8)