पेपर 1 · बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र

बाल्यावस्था और किशोरावस्था की अवधारणा

75 प्रश्न · 4 अध्याय टेस्ट

इस अध्याय के बारे में

यह अध्याय यह आधारभूत CDP विचार बनाता है कि बाल्यावस्था और किशोरावस्था कोई स्थिर जैविक तथ्य नहीं, बल्कि सामाजिक निर्माण (social construction) हैं जो समय, स्थान और संस्कृति के अनुसार बदलते हैं। यह बाल्यावस्था के चार परिप्रेक्ष्य — मानवशास्त्रीय, समाजशास्त्रीय, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक — विकसित करता है (फिलिप एरीज़, जॉन होल्ट, मेयल, जेम्स व जेम्स, कालुली व जापानी माँ के उदाहरण); फिर बच्चे को चार दृष्टियों से परिभाषित करता है — आयु मानदण्ड, वैधानिक दृष्टि (बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन 18 वर्ष से नीचे, NCPCR 0-18, बाल न्याय अधिनियम 14 वर्ष से कम, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 — 6 से 14 वर्ष, संविधान का अनुच्छेद 21अ व अनुच्छेद 45, बाल श्रम निषेध एवं विनियमन अधिनियम 1986, भारतीय खान अधिनियम), श्रमिक के रूप में बच्चा, और सामाजिक नीति में बच्चा। यह किशोरावस्था को 19वीं शताब्दी के अन्त में गढ़े गए शब्द के रूप में प्रस्तुत करता है, लैटिन क्रिया 'एडोल्सेरे' से व्युत्पत्ति बताता है, यौवनारम्भ (puberty) व तारुण्य (pubescence) में अन्तर स्पष्ट करता है, और तीन चरण — प्रारंभिक (10-13), मध्य (14-15), परवर्ती (16-18) — सूचीबद्ध करता है। समोआ, नवाजो, तमिलनाडु, नायर व चुक्तिया भुंजिया अनुष्ठानों से किशोरावस्था को सांस्कृतिक निर्माण के रूप में दिखाता है। अन्त में बच्चा, किशोर व व्यस्क में आयु, पहचान-खोज, अस्थिरता, स्व-केन्द्रण, द्विधा तथा तीन विकासात्मक क्षेत्रों के आधार पर अन्तर बताता है। CTET पेपर 1 इसकी परीक्षा सीधे स्मरण (RTE, JJ Act, अनुच्छेद 21अ की आयु-सीमा), अवधारणात्मक प्रश्नों (सामाजिक निर्माण, सांस्कृतिक निर्माण, puberty व pubescence में अन्तर) और शिक्षाशास्त्र प्रश्नों (रामपुर की शिक्षिका विविध पृष्ठभूमि के बच्चों को संभालती हुई) से लेता है। नीचे दिए चार टेस्ट — अभ्यास 15, क्विज़ 15, कठिन 15, निपुणता 30 — इन छहों विषयों को CTET स्तर पर जाँचते हैं।

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