पेपर 2 · बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र

बचपन और किशोरावस्था की अवधारणा

75 प्रश्न · 4 अध्याय टेस्ट

इस अध्याय के बारे में

'बचपन और किशोरावस्था की अवधारणा' — यह पेपर II बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र (CDP) का आधारभूत अध्याय है। यह अध्याय यह बताता है कि बाल्यावस्था और किशोरावस्था कोई स्थिर जैविक चरण नहीं, बल्कि संस्कृति, इतिहास, अर्थव्यवस्था और कानून द्वारा गढ़ा गया सामाजिक निर्माण (social construction) हैं। यह अध्याय बाल्यावस्था के चार परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करता है — मानवशास्त्रीय (बच्चे 'लघु प्रौढ़ों' के रूप में, विकासात्मक स्थान/developmental niche), समाजशास्त्रीय (बाल्यावस्था प्रौढ़ों का निर्माण), ऐतिहासिक (फिलिप एरिस 1962, जॉन हॉल्ट 1974; बाल्यावस्था 16वीं-17वीं शताब्दी की रचना), और सांस्कृतिक (भारतीय माँ बनाम कालुली बनाम जापानी माँ के उदाहरण)। फिर 'बच्चे' की परिभाषा चार दृष्टियों से दी गई है — आयु (जन्म से यौवनारम्भ, लगभग 13 वर्ष), वैधानिक (बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन 18 वर्ष से नीचे; एन.सी.पी.सी.आर 0-8; बाल न्याय अधिनियम 14 वर्ष से नीचे; शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 — 6 से 14 वर्ष; अनुच्छेद 21अ; अनुच्छेद 45; बाल श्रम अधिनियम 1986 — 14 वर्ष से कम; भारतीय खान अधिनियम 18 वर्ष से नीचे), श्रमिक के रूप में बच्चा, और सामाजिक नीति। किशोरावस्था को औद्योगिक क्रांति के बाद की धारणा बताया गया है; लैटिन क्रिया 'एडोल्सेरे' (adolescere) से व्युत्पन्न; तीन चरण — प्रारंभिक (10-13 वर्ष), मध्य (14-15 वर्ष), परवर्ती (16-18 वर्ष) — जो उच्च प्राथमिक शिक्षक की कक्षा के विद्यार्थियों से सीधे जुड़े हैं। अंत में बच्चा, किशोर और प्रौढ़ के बीच आयु, शारीरिक, संज्ञान, सामाजिक, संवेगात्मक और प्रत्यक्षण के आधार पर भिन्नताएँ दी गई हैं। CTET पेपर II इस अध्याय की परीक्षा परिभाषा, आयु बनाम निर्माण, RTE/JJ अधिनियम/अनुच्छेद 21अ की आयु-सीमाओं, किशोरावस्था के तीन चरणों, यौवनारम्भ बनाम तारुण्य, और चार परिप्रेक्ष्यों पर लेता है। नीचे दिए चार टेस्ट — अभ्यास 15, क्विज़ 15, कठिन 15, निपुणता 30 — सभी छहों धाराओं को CTET स्तर पर जाँचते हैं।

इस अध्याय के टेस्ट